कबूतरों का जीवन आपदा का ईंधन है… वी. यशोवर्मसूरिजी

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मुंबई वार्ता/सतीश सोनी

जब हज़ारों की संख्या में निरीह पक्षियों के प्राण बिना अन्न-जल के तितर-बितर हो रहे हों, तब जिनके हृदय में श्री राम और श्री वीर बसते हैं, उनके लिए मूक दर्शक बनकर बैठना उतना ही व्यर्थ है जितना रोम के जलते हुए वायलिन बजाना। “दया धर्म का मूल है” – एक राष्ट्र जो “अहिंसा परमो धर्म” को अपने हृदय में धारण करके जीता है… ऐसे समय में राष्ट्रधर्म का पालन न करना अपराध है। देशभक्तों का जागना आवश्यक है ताकि यह भीषण हिंसा देश को आपदा की आग में और न ले जाए। उस समय कोयना भूकंप के पीछे के वैज्ञानिक कारण का उल्लेख अखबार में किया गया था।

“मरते हुए प्राणियों की चीखें” ये मूक प्राणी मर रहे हैं, इसलिए बोलने वालों जागो। सीमा के भीतर सब कुछ ठीक से करो। विदेश में एक मामला आया। कार्यालय में सिगरेट पीने वाली एक महिला कर्मचारी को कैंसर हो गया। न्यायालय इस व्यक्ति को न्यायालय में दोषी ठहराएगा। अदालत जाँच पूरी करके आरोपियों को मोटी रकम देगी। ऐसी सिगरेटें विज्ञापनों के साथ बेची जाती हैं। टाटा अस्पताल में कैंसर के मामले ज़्यादातर मसालों और तंबाकू की वजह से होते हैं, लेकिन ये हर जगह लटके रहते हैं।

परमिट रूम में हर जगह दुकानों में शराब मिलती है। बीयर बार को अनुमति मिलती है। क्या ये सब चीज़ें शरीर को फ़ायदा पहुँचा रही हैं?? उसके लिए कोई नहीं है.. देश हमारा है – सरकार हमारी है, कबूतर हमारे हैं.. हम चुप क्यों बैठे हैं? शायद हम पाप में भी नहीं पड़ रहे हैं.. क्योंकि अगर चोर पड़ोसी के घर चोरी करने आएँ और हम उसे देख लें, तो कहा जाएगा कि हमने अपने पड़ोसी का धर्म त्याग दिया है। तो इन मासूम, बेचारे कबूतरों को भूख, प्यास और मार से मरते देखकर हम कुछ नहीं करते??? क्या इसे मानव धर्म की हानि कहते हैं?? जिस देश में एक कबूतर के लिए खुद को बलिदान करने वाले राजा मेघनाथ ने चुपके से अपने बेटों को कबूतर मारकर बनाई गई दवा पिलाई और उन्हें अग्नि स्नान कराया, वह देश का आदर्श है, यानी मुंबई की जनता का.. अब तो हद हो गई।अब, सरहद पर जाओ.. जा सको तो जाओ.. तन में पल नहीं है। ज़िंदा हो तो बंधे मत रहो। डर की वजह से हो, लालच की वजह से हो या किसी रिश्ते की वजह से.. “जगन्नाथ बैठे हैं, उठो सब लोग साथ”

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