श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री एवं अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने बताया केंद्र सरकार ने तुअर (अरहर/लाल चना) के लिए मुक्त आयात नीति को एक और साल के लिए बढ़ाकर 31 मार्च, 2026 कर दिया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने सोमवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। पहले की नीति शर्त के अनुसार, तुअर के लिए शुल्क मुक्त आयात अवधि 31 मार्च, 2025 तक थी।
नई फसल की आवक के साथ ही मंडी की कीमतें कम हो गई हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्तर से नीचे चल रही हैं। केंद्र ने खरीफ 2024 विपणन सत्र के लिए 7550 रुपये प्रति क्विंटल का एमएसपी घोषित किया है। पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, तुअर का उत्पादन लगभग 35.02 लाख टन होने का अनुमान है, जो पिछले साल के 34.17 लाख टन उत्पादन से लगभग 2.5 प्रतिशत अधिक है।
पिछले साल तुअर, उड़द और चना जैसी दालों का उत्पादन कम होने से आपूर्ति में कमी के कारण कीमतों में उछाल आया था। घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने तुअर, उड़द और मसूर के लिए शुल्क मुक्त आयात नीति को 31 मार्च, 2025 तक बढ़ा दिया था। तुअर के शुल्क मुक्त आयात में नवीनतम संशोधन से आपूर्ति और सामर्थ्य में और वृद्धि होने की उम्मीद है। कीमतों में उछाल के बाद सरकार उपभोक्ताओं के लिए सामर्थ्य सुनिश्चित करने और स्थिर मूल्य व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों और उपलब्धता पर बारीकी से नजर रख रही है।
खाद्य मंत्रालय ने हाल ही में कहा कि अच्छी बुवाई और अनुकूल मिट्टी की नमी और मौसम की स्थिति के कारण चना और मसूर का उत्पादन अच्छा होने की उम्मीद है। पीली मटर के शुल्क मुक्त आयात को 20 फरवरी, 2025 तक की अनुमति दी गई है, जबकि चना के आयात को 31 मार्च, 2025 तक की अनुमति दी गई है। दालों की खुदरा कीमतों पर सीधा प्रभाव डालने के लिए, सरकार ने भारत ब्रांड के तहत चना दाल, मूंग दाल और मसूर दाल की बिक्री जारी रखी है। सरकार ने हाल ही में कहा कि इन उपायों से जनवरी, 2024 में सीपीआई दालों की मुद्रास्फीति दर को 19.54 प्रतिशत से घटाकर दिसंबर, 2024 में 3.83 प्रतिशत करने में मदद मिली है।
शंकर ठक्कर ने आगे कहा प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र और कर्नाटक में तुवर की कटाई चल रही है ऐसे वक्त पर सरकार द्वारा लिए गए इस निर्णय से दाम कम हो सकते हैं जिसका सीधा असर किसानों को अपनी उपज का सही दाम न मिलने की संभावनाएं बन सकती है। यदि ऐसा होता है तो किसान अगले साल फिर तुवर की बुवाई काम करेगा जिससे उपलब्धता कम होगी और भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ सकता है।


