महाड़ सत्याग्रह का स्मरण।

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■ महाड़ केवल एक सार्वजनिक तालाब तक पहुँच का मुद्दा नहीं था। यह उस समाज में ‘व्यक्तित्व’ (Personhood) की घोषणा थी जिसने क्रमिक असमानता को सामान्य बना दिया था।

प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुडी पंडित(कुलपति,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

भारतीय इतिहास और व्यापक सार्वजनिक स्मृति में एक सामान्य प्रवृत्ति रही है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के कुछ क्षणों को ‘निर्णायक मोड़’ के रूप में याद किया जाता है, जबकि अन्य को चुपचाप हाशिए के फुटनोट तक सीमित कर दिया जाता है। यह चयनात्मक स्मरण इन घटनाओं के नैतिक, राजनीतिक और प्रासंगिक अर्थों के साथ जुड़ने के अवसरों को और भी कम कर देता है। उन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में उस ‘टूर डी फोर्स’ (असाधारण उपलब्धि) के रूप में शायद ही कभी देखा जाता है, जैसी वे वास्तव में थीं।1927 का महाड़ सत्याग्रह इसी असहज स्थान पर खड़ा है। इसे उद्धृत किया जाता है, स्मरण किया जाता है, कभी-कभी मनाया भी जाता है, फिर भी इसका सामना शायद ही कभी किया जाता है। जो याद रखा जाता है, वह डॉ. बाबासाहेब।

बी.आर. अंबेडकर द्वारा हजारों लोगों का नेतृत्व करते हुए चवदार तालाब से पानी पीने का चित्र है, लेकिन जो भुला दिया जाता है, वह निरंतर परेशान करने वाला प्रश्न है—एक समाज के लिए पानी जैसी बुनियादी चीज़ से वंचित करने का क्या अर्थ है? और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि उन संरचनाओं को ध्वस्त करने के लिए क्या आवश्यक है जो इस तरह के निषेध को संभव बनाती हैं?इस अर्थ में, महाड़ केवल एक सार्वजनिक तालाब तक पहुँच के बारे में नहीं था। यह उस समाज में ‘व्यक्तित्व के दावे’ (Assertion of personhood) के बारे में था जिसने क्रमिक असमानता को सामान्य बना दिया था। पानी पीने का कार्य राजनीतिक बन गया क्योंकि सामाजिक व्यवस्था ने उसे ऐसा बना दिया था। जब बाबासाहेब अंबेडकर और सत्याग्रहियों ने तालाब की ओर प्रस्थान किया, तो वे केवल उस नागरिक अधिकार का दावा नहीं कर रहे थे जो कानून में पहले से ही दिया गया था, बल्कि वे उस समाज के खालीपन को उजागर कर रहे थे जो समानता का कानून तो बना सकता था लेकिन उसे व्यवहार में लाने से इनकार करता था।

इसके बाद हुई हिंसा, तालाब का “शुद्धिकरण” और लंबी कानूनी लड़ाइयों ने उस दावे के प्रति सामाजिक प्रतिरोध की गहराई को ही पुष्ट किया।इस प्रकार, महाड़ केवल एक शिकायत के बारे में नहीं था; बल्कि, यह सामाजिक अंतर्विरोधों का एक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और वंचितों के अधिकारों का पुनर्मूल्यांकन था। फिर भी, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के व्यापक आख्यान में, महाड़ वह स्थान नहीं पा सका जिसका वह हकदार है।

‘नमक सत्याग्रह’ राष्ट्रीय चेतना में उपनिवेशवाद विरोधी लामबंदी के एक परिभाषित क्षण के रूप में अंकित है। इसके विपरीत, महाड़ के साथ आज भी बड़े पैमाने पर एक क्षेत्रीय या “दलित” मुद्दे के रूप में व्यवहार किया जाता है। इस तरह का कमतर आंकलन हानिकारक है क्योंकि ‘पानी तक किसकी पहुंच हो सकती है’ जैसे प्रश्न पूछना नागरिकता की अवधारणा और स्वयं ‘भारत’ के विचार के लिए मौलिक है।यह हाशिए पर धकेला जाना आकस्मिक नहीं है। यह भारतीय समाज के आंतरिक पदानुक्रमों का सामना करने में उसी गंभीरता की कमी को दर्शाता है, जिसके साथ औपनिवेशिक प्रभुत्व को संबोधित किया जाता है। आंतरिक अन्याय की जांच करने की तुलना में बाहरी दमनकारी के खिलाफ प्रतिरोध का जश्न मनाना आसान है। ऐसा चयनात्मक स्मरण न केवल संघर्ष करने वालों की भावना के लिए हानिकारक है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम भी होते हैं। यह महाड़ को एक ‘जीवंत चुनौती’ के बजाय केवल एक ‘प्रतीकात्मक मील के पत्थर’ में बदल देता है। हम देखते हैं कि वर्षगांठ मनाई जाती है, मूर्तियों पर मालाएँ चढ़ाई जाती हैं, भाषण दिए जाते हैं, लेकिन महाड़ के केंद्र में निहित आवश्यक मांग और विचार समय के साथ नरम पड़ गए हैं। समानता पर जोर को सही ढंग से स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन इस ऐतिहासिक घटना के निहितार्थों को काफी हद तक स्थगित कर दिया गया है।

अब प्रश्न यह नहीं है कि क्या हमें महाड़ याद है। इसके बजाय, हमें इस पर पुनर्विचार करना चाहिए कि हमें इसे कैसे याद रखना है। सरल शब्दों में, क्या हम महाड़ को एक पूर्ण अध्याय के रूप में देखते हैं या एक ‘अधूरे तर्क’ के रूप में?डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने स्वयं महाड़ को एक अलग-थलग कार्य के रूप में नहीं देखा था। यह संघर्ष केवल संसाधनों तक पहुँच के लिए नहीं बल्कि जाति के वैचारिक आधारों के विरुद्ध था। महाड़ एक शुरुआत और एक घोषणा दोनों था: कि गरिमा का समझौता ऐसे ढांचे के भीतर नहीं किया जा सकता जो इसके मूल में ही गरिमा को नकारता हो। इसे केवल “समाज सुधार” के क्षण तक सीमित करना, हिंदू समाज की उस संरचना की गहरी आलोचना के रूप में इसके महत्व को खो देना है, जो तब अस्तित्व में थी और कई मायनों में आज भी बनी हुई है।

महाड़ का इतिहास-लेखन (Historiography) इसी असहजता को दर्शाता है। मुख्यधारा के विवरण अक्सर इसे स्वीकार करते हैं लेकिन इस पर विस्तार से चर्चा नहीं करते। इसे संवैधानिक प्रावधानों के अग्रदूत, अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता के उन्मूलन की दिशा में एक कदम, या बाबासाहेब अंबेडकर की राजनीतिक यात्रा के एक प्रकरण के रूप में दिखाया जाता है। इस ढांचे में जो खो जाता है, वह बहिष्कार की उस ‘अनुभवात्मक वास्तविकता’ का आयाम है जिसका महाड़ ने सामना करने की कोशिश की थी। वह बच्चा जो कक्षा में पानी नहीं पी सकता, वह यात्री जिसे रेलवे स्टेशन पर पानी देने से मना कर दिया गया, वह श्रमिक जिसे सार्वजनिक स्थानों से बाहर रखा गया—ये अमूर्त आंकड़े नहीं बल्कि बार-बार होने वाली वास्तविकताएं हैं।

महाड़ सीधे उनसे बात करता है, फिर भी हमारे आख्यान अक्सर घटना से सीधे उसके कानूनी परिणामों की ओर इतनी तेजी से बढ़ जाते हैं, मानो कानून के पारित होने से स्थिति हल हो गई हो।कानून और जमीनी वास्तविकता के बीच का यही अंतर वह स्थान है जहाँ महाड़ अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है। संविधान पर उस संघर्ष की छाप है, लेकिन संवैधानिक नैतिकता केवल पाठ (text) के सहारे नहीं टिक सकती। इसके लिए एक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है जो अभी पूरा होने से कोसों दूर है। पानी, स्वच्छता, आवास और शिक्षा तक पहुँच में जाति-आधारित भेदभाव की निरंतरता संरचनात्मक है, आकस्मिक नहीं। जब गांवों में जल स्रोतों के अलग-थलग होने या हाथ से मैला ढोने वालों की खबरें आती रहती हैं, तो महाड़ एक ऐतिहासिक घटना नहीं रह जाता। इसके बजाय, यह भारत के उन कोनों के लिए एक दर्पण बन जाता है जहाँ ऐसी प्रथाएँ (कभी-कभी अधिक परिष्कृत रूप में) जारी हैं।इसलिए समस्या केवल स्मरण की नहीं, बल्कि जुड़ाव (Engagement) की है।

ठोस परिवर्तन के बिना प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व टालमटोल का एक रूप बन जाता है। यह समाज को अन्याय को स्वीकार करने की अनुमति तो देता है लेकिन उसे संबोधित करने की नहीं। महाड़ इस सुविधा को चुनौती देता है। यह मांग करता है कि हम केवल औपचारिकताओं से आगे बढ़कर वास्तविक परिवर्तन की ओर बढ़ें।इसके लिए सामूहिक चेतना के भीतर महाड़ की स्थिति पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। इसे केवल दलित इतिहास या अंबेडकरवादी विमर्श तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे आधुनिक भारत के निर्माण के केंद्र के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। “पानी का अधिकार” जीवित प्राणियों के लिए एक सार्वभौमिक दावा है। और उस अधिकार के हनन को एक मामूली मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सबसे मौलिक अधिकारों में से एक के रूप में देखा जाना चाहिए।

महाड़ को हाशिए के बजाय केंद्र में रखकर हम समानता के अपने पुनर्मूल्यांकन के अधूरे कार्यों का सामना करने के लिए बाध्य होते हैं।इसके लिए एक अधिक ईमानदार इतिहास-लेखन की भी आवश्यकता है, जो संघर्ष को केवल प्रगति की कहानियों तक सीमित न करे। महाड़ को शत्रुता, हिंसा और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ा था। इसने भीतर से समाज सुधार की सीमाओं को उजागर किया। इसके साथ गंभीरता से जुड़ने का अर्थ यह स्वीकार करना है कि समानता का संघर्ष हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, और वे चुनौतियां आज भी जारी हैं।महाड़ की शताब्दी, या इसका कोई भी स्मरणोत्सव, केवल एक औपचारिक अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। यह आत्मनिरीक्षण का अवसर होना चाहिए।

जैसे-जैसे हम महाड़ की शताब्दी के करीब पहुँच रहे हैं, हमें खुद से पूछना चाहिए: क्या गरिमा का वादा एक वास्तविकता बन गया है? या यह अभी भी जाति और स्थान के आधार पर असमान रूप से विभाजित है? क्या हम उन दैनिक प्रथाओं का सामना करने के लिए तैयार हैं जो असमानता को बनाए रखती हैं, या हम केवल प्रतीकात्मक स्वीकारोक्ति की सुविधा पसंद करते हैं?महाड़ कोई आसान उत्तर नहीं देता। यह एक मानक (standard) प्रदान करता है जिसके विरुद्ध समाज स्वयं को माप सकता है। इसका सम्मान करना केवल इसकी कहानी को दोहराना नहीं है, बल्कि इसके कार्यों को आगे बढ़ाना है। इसका अर्थ यह पहचानना है कि जातिविहीन समाज की आकांक्षा केवल एक नारा बनकर नहीं रह सकती, जिसे भाषणों में तो याद किया जाए लेकिन व्यवहार में अनदेखा कर दिया जाए। इसे एक ठोस, बिना शर्त प्रतिबद्धता के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

महाड़ को केवल प्रतीकों के दायरे में छोड़ने का खतरा यह है कि यह स्मरण के आवरण में असमानता को पनपने की अनुमति देता है। अतः चुनौती इसे वापस ‘कार्रवाई’ (action) के क्षेत्र में लाने की है। चवदार तालाब के पानी को कभी रोका गया था, लेकिन एक सदी बाद सवाल बना हुआ है: क्या “कानून” और “वास्तविकता” के रूप में समानता का विचार उतनी ही स्वतंत्र रूप से बह रहा है जितना इसे बहना चाहिए? विकसित भारत के विजन को भारतीय समाज को वास्तव में अधिक समावेशी और समतावादी बनाने की आवश्यकता है।

जाति का उन्मूलन ही महाड़ सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि और हमारा मिशन होना चाहिए। प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुडी पंडित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलगुरु हैं।

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