“हिंदी का दर्द”

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विनोद पाठक/ मुंबई वार्ता

आजादी को पचहत्तर बरस बीत गए,

भारत माँ के माथे पर कितने ही दीप जले,

पर हिंदी, जो दिल की धड़कन है हमारी,

अब तक राजभाषा की कुर्सी को तरसे खड़ी।

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक,

मंचों पर हिंदी में देते हैं सब तक़रार,

पर संसद की दीवारों में,

काग़ज़ की ज़ंजीरों में,

अंग्रेज़ी का राज अभी भी बरकरार।

हिंदी, जिसे गंगा की धारा सा निर्मल कहा,

हिंदी, जिसने सबको एक सूत्र में पिरोया,

आज वही अपनी ही धरती पर बेगानी बने,

क्योंकि नेताओं ने वादों से ही उसे संजोया।

सरकार की उदासीनता सवाल खड़े करती है,

क्या मातृभाषा का मान इतना भी कठिन है?

जब विश्व में हिंदी के बोलने वाले करोड़ों हों,

तो अपने ही देश में क्यों यह बंधन है?

विनोद पाठक की अपील है प्रधानमंत्री से,

अब देर न कीजिए, संकल्प उठाइए,

हिंदी को उसका हक़, उसका सम्मान दिलाइए,

भारत की असली राजभाषा का ताज पहनाइए।

हिंदी दिवस पर यही पुकार हो जाए,

हिंदी की ध्वजा विश्व में और ऊँची लहराए।

मातृभाषा का गौरव जब संसद में गूंजेगा,

तभी सच्चा आज़ादी का पर्व समझा जाएगा।

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