मुंबई वार्ता/कृष्ण गोपाल सिंह

भिवंडी महानगरपालिका में पहली बार 12 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली राकांपा (शरद) के पास इस बार महापौर पद की चाबी आ गई है। राकांपा (शरद) भाजपा या कांग्रेस में से जिसे भी समर्थन देगी, उसी का मनपा में महापौर बनना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, इन तमाम समीकरणों के बीच कोणार्क विकास आघाड़ी को कम आंकना राजनीतिक भूल साबित हो सकता है क्योंकि वह पूर्व में सीमित संख्या में नगरसेवक होने के बावजूद महापौर बना चुकी है।


भिवंडी मनपा चुनाव में राकांपा (शरद) किंगमेकर के रूप में उभरी है। पहली बार पार्टी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की है, जिसके बाद उसका समर्थन निर्णायक हो गया है। चुनाव परिणामों में कांग्रेस 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है जबकि भाजपा–शिवसेना (शिंदे) महायुति को कुल 34 सीटें मिली हैं।
सूत्रों के अनुसार यदि कांग्रेस के 30 और राकांपा (शरद) के 12 नगरसेवक एकजुट होते हैं तो यह संख्या 42 तक पहुंच जाती है। ऐसे में यदि कोणार्क विकास आघाड़ी के 4 नगरसेवकों का समर्थन भी मिल जाए तो कांग्रेस महापौर पद के लिए आवश्यक 46 के जादुई आंकड़े को पार कर सकती है।दूसरी ओर, भाजपा और शिवसेना (शिंदे) के पास मिलकर 34 नगरसेवक हैं और उन्हें महापौर बनाने के लिए 12 और नगरसेवकों की आवश्यकता है।
भाजपा की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल पाटिल के भतीजे सुमित पाटिल तथा साफ-सुथरी छवि वाले नारायण चौधरी महापौर पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। बताया जाता है कि नारायण चौधरी के सपा विधायक रईस शेख और सांसद सुरेश म्हात्रे उर्फ बाल्या मामा से भी अच्छे संबंध हैं।
जानकारों का कहना है कि यदि राकांपा (शरद) के 12 नगरसेवकों का समर्थन भाजपा को मिलता है, तो भाजपा भी अपना महापौर बना सकती है। इससे पहले कोणार्क विकास आघाड़ी छह नगरसेवकों के सहारे भी महापौर बना चुकी है।
ऐसे में अब सभी की निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा और भिवंडी मनपा को अगला महापौर कौन मिलेगा।


