श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (MSCB) घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को बड़ा झटका लगा है। विशेष अदालत ने बुधवार को इस मामले में सभी आरोपियों को डिस्चार्ज (मुक्त) कर दिया, जिससे वर्षों से चल रही जांच पर विराम लग गया।


इस मामले में जिन प्रमुख नेताओं को राहत मिली है, उनमें पूर्व मंत्री रंजीत देशमुख, अर्जुन खोतकर, रोहित पवार, प्राजक्त तनपुरे, उनके पिता और पूर्व सांसद- विधायक प्रसाद तनपुरे, सुभाष देशमुख सहित अन्य सहयोगी फर्म और जरांदेश्वर शुगर मिल्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।
■ ईओडब्ल्यू की क्लोजर रिपोर्ट बनी आधार
यह फैसला इसलिए आया क्योंकि इससे पहले मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा था कि बैंक में कोई धोखाधड़ी नहीं हुई। अदालत ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। चूंकि ईडी का मामला इसी एफआईआर पर आधारित था, इसलिए मूल (predicate) अपराध खत्म होते ही मनी लॉन्ड्रिंग केस भी टिक नहीं सका।
■ अदालत का स्पष्ट रुख
विशेष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब मूल अपराध में आरोपी बरी या डिस्चार्ज हो जाते हैं, तो मनी लॉन्ड्रिंग का मामला नहीं चल सकता। अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘C’ समरी स्वीकार करना, कानूनी रूप से बरी होने के समान है।
■ सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विजय चौधरी केस का जिक्र करते हुए कहा कि PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग) का अपराध अपने आप में स्वतंत्र नहीं है। यदि मूल अपराध ही नहीं है, तो मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी नहीं बनता।
■ राजनीतिक असर भी रहा
यह मामला पिछले छह वर्षों से राज्य की राजनीति में चर्चा का विषय रहा और इस पर आरोप लगते रहे कि इसका इस्तेमाल विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा था।
ईडी ने जांच के दौरान इन नेताओं से जुड़ी कई संपत्तियों को अटैच किया था, जिन्हें कथित तौर पर अवैध कमाई से जोड़ा गया था।
आरोपियों की ओर से पेश वकील ने कहा कि जब मूल अपराध ही नहीं बचा, तो मनी लॉन्ड्रिंग का सवाल ही नहीं उठता।
इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चल रहा यह चर्चित और संवेदनशील मामला फिलहाल समाप्त हो गया है।


