“हाँ… आता है मुझको ग़ुस्सा”

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डॉ मंजू लोढ़ा/ स्तंभकार/मुंबई वार्ता

हाँ…आता है मुझको ग़ुस्सा…

जब कोई झूठ की चादर ओढ़ लेता है,

बिलकुल साफ़ झूठ…और दुनिया,

बिना सोचे-समझे तालियाँ बजा देती है!

ग़ुस्सा आता है

जबकोई अफ़वाह का तीर छोड़कर,

किसी मासूम का चैन छीन लेता है।

जब कोई…किसी की पीठ पीछे ज़हर घोलता है,

और सामने…मक्खन जैसी मुस्कान ओढ़ लेता है।

ग़ुस्सा आता है जबकाबिलियत को पीछे धकेल दिया जाता है,

और सिफारिशों की सीढ़ियाँ बिना मेहनत के ऊँचाई तक पहुँच जाती हैं।

पर फिर सोचती हूँ…क्या मैं बदल सकती हूँ किसी को?

क्या मैं रोक सकती हूँ इन बुराइयों की बाढ़ को?

शायद नहीं…

हर युग में यह सब होता आया है,

यह आज का ही नहीं,सदियों से चलता आ रहा सच है।

लेकिन हाँ…अगर कुछ बदलना है—तो मैं ख़ुद को बदल सकती हूँ।

अपने भीतर छिपे विकारों को समाप्त करने की कोशिश कर सकती हूँ,

मैं अपने भीतर के उस उबलते ग़ुस्से को धीरे-धीरे शांति में ढाल सकती हूँ।

जब मैं…अपने अंतर्मन को एक शांत झील बना लूँगी,

तब ही देख पाऊँगी—सत्य को… स्पष्ट।

तब ही होगा…मेरा आत्म कल्याण।

और शायद…मुझे देखकर कोई और भी रास्ता बदल ले!

हाँ…ग़ुस्सा तो आता है…

पर अब दूध के उबाल की तरह,

हां मैं उसे साधना सीख रही हूँ।

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