मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र में सूखे और फसल बर्बादी से जूझ रहे किसानों को दिवाली से पहले ₹5,000 की आर्थिक सहायता देने के राज्य सरकार के फैसले को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की घोषणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि महज ₹5,000 देने से किसानों की समस्याएं दूर नहीं होंगी।
वहीं, भाजपा के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता नवनाथ बन ने कांग्रेस नेताओं पर पलटवार करते हुए पूछा कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार किसानों को केवल ₹2,500 की सहायता देकर उनके साथ कथित रूप से छल कर रही है, तो सपकाल और विजय वडेट्टीवार उससे जवाब क्यों नहीं मांगते?


■ सपकाल ने सुनाई सूखाग्रस्त किसान की व्यथा
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर वाशिम जिले के पांडव उमरा और तांदळी क्षेत्र में सूखे की स्थिति का जायजा लेने के दौरान सामने आए एक युवा किसान की पीड़ा साझा की। उन्होंने बताया कि खेत में सूखती तूर की फसल, पशुओं के चारे की कमी, बहन की शादी की जिम्मेदारी और सिर पर कर्ज के बोझ से परेशान किसान अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सका। अपनी मेहनत से तैयार की गई फसल को आंखों के सामने बर्बाद होते देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
सपकाल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सवाल किया कि किसानों को केवल ₹5,000 देकर उनकी परेशानियां कैसे दूर की जा सकती हैं? बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और कर्ज का बोझ उठाने वाले किसानों के लिए यह राशि पर्याप्त कैसे होगी?
उन्होंने कहा कि खेतों में जाकर निरीक्षण करने और तस्वीरें खिंचवाने से किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। सरकार को ठोस फैसले लेने चाहिए। किसानों को भाषण और आश्वासन नहीं, बल्कि उनका अधिकार मिलने वाली पर्याप्त आर्थिक सहायता चाहिए। सपकाल ने कहा कि यदि सरकार किसानों की आंखों के आंसू नहीं पोंछ सकती, तो कम से कम उनके दुख का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
■ भाजपा ने कर्नाटक सरकार के सहायता पैकेज पर उठाए सवाल
सपकाल के आरोपों के जवाब में भाजपा प्रदेश मुख्य प्रवक्ता नवनाथ बन ने गुरुवार को मुंबई स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार परिषद में कांग्रेस नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिवाली से पहले प्रत्येक किसान को ₹5,000 की सहायता देने की घोषणा की है। यह अंतिम सहायता नहीं, बल्कि अग्रिम राहत राशि है। फसल नुकसान के पंचनामे पूरे होने के बाद राष्ट्रीय आपदा राहत मानदंडों के अनुसार प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त सहायता देने की घोषणा महायुति सरकार करेगी।
बन ने कांग्रेस नेताओं हर्षवर्धन सपकाल, विजय वडेट्टीवार, नाना पटोले और रोहित पवार से सवाल किया कि यदि महाराष्ट्र में किसानों को दी जा रही ₹5,000 की सहायता अपर्याप्त है, तो वे कर्नाटक की कांग्रेस सरकार से जवाब क्यों नहीं मांगते? उनके अनुसार, कर्नाटक में सूखे की स्थिति में प्रत्येक किसान को केवल ₹2,500 की सहायता दी गई, जबकि महाराष्ट्र में किसानों को इससे दोगुनी राशि दी जा रही है।
उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक सरकार ने सूखे से निपटने के लिए कुल ₹1,250 करोड़ का प्रावधान किया है, जबकि महाराष्ट्र सरकार ने ₹6,000 करोड़ की पहली किस्त अग्रिम सहायता के रूप में दी है। बन ने कहा कि महायुति सरकार किसानों की मदद के लिए केवल इस राशि तक सीमित नहीं रहेगी और फसल नुकसान के आकलन के बाद आगे भी सहायता दी जाएगी।
■ चारा शिविरों, कर्जमाफी और बिजली बिलों का भी उठाया मुद्दा
भाजपा नेता ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों के लिए किए गए प्रावधानों की तुलना करते हुए दावा किया कि महाराष्ट्र में चारा शिविरों के लिए लगभग ₹62 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जबकि कर्नाटक में इसके लिए केवल ₹25 करोड़ रखे गए हैं।
बन ने आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार ने किसानों का कर्ज माफ करने के बजाय कर्ज वसूली की समय सीमा एक वर्ष बढ़ाई है। इसके विपरीत, उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र में महायुति सरकार ने किसानों के लगभग ₹2 लाख तक के कर्ज माफ करने की योजना के तहत अब तक 58 लाख किसानों को सहायता दी है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसानों के बकाया बिजली बिलों के मद में ₹48,000 करोड़ की सहायता दी जा रही है और इस सहायता की वसूली नहीं की जा रही है। इन दावों के आधार पर बन ने कांग्रेस नेताओं से पूछा कि जिन राज्यों में उनकी सरकार है, वहां किसानों को महाराष्ट्र के समान सहायता क्यों नहीं दी जा रही है।
■ किसानों की सहायता पर राजनीतिक टकराव तेज
एक ओर कांग्रेस सूखे, फसल बर्बादी और किसानों की बढ़ती आर्थिक परेशानियों का हवाला देकर महाराष्ट्र सरकार की सहायता राशि को अपर्याप्त बता रही है, वहीं भाजपा इसे अंतरिम राहत बताते हुए आगे अतिरिक्त सहायता देने का भरोसा दिला रही है। भाजपा ने कांग्रेस को कर्नाटक में किसानों के लिए किए गए प्रावधानों पर जवाब देने की चुनौती दी है।
इस राजनीतिक विवाद के बीच किसानों की मुख्य मांग पर्याप्त मुआवजे, फसल नुकसान के आकलन और कर्ज के बोझ से राहत को लेकर बनी हुई है। हालांकि, दोनों पक्षों की ओर से जारी आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से नहीं की गई है।


