■ एसईटी की निष्कर्ष रिपोर्ट के आधार पर विभागीय कार्रवाई अवैध
मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के अधिकारी समीर दयानंद वानखेड़े के विरुद्ध जारी विभागीय आरोप-पत्र को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि विशेष जांच दल (एसईटी) की रिपोर्ट, जो केवल प्रारंभिक जांच की प्रकृति की होती है, के आधार पर न तो विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है और न ही उसे बनाए रखा जा सकता है।


अधिकरण ने यह भी पाया कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) सहित संबंधित प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली गंभीर त्रुटियों से ग्रस्त थी तथा उसमें संस्थागत पक्षपात के संकेत मिलते हैं।
● पृष्ठभूमि एवं सेवा विवरण
समीर वानखेड़े वर्ष 2008 बैच के आईआरएस अधिकारी हैं और वर्तमान में राजस्व विभाग में अपर आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। इससे पूर्व वे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), मुंबई में जोनल निदेशक के रूप में पदस्थ थे। लगभग दो दशक की सेवा अवधि में उन्होंने सीमा शुल्क, डीआरआई, एनआईए और एनसीबी जैसे महत्वपूर्ण संगठनों में सेवाएं दी हैं। उन्हें वर्ष 2021 में गृह मंत्री पदक (जांच में उत्कृष्टता) सहित अनेक प्रशस्तियां प्राप्त हुई हैं।
यह विवाद अक्टूबर 2021 से जुड़ा है, जब एनसीबी मुंबई ने कॉर्डेलिया क्रूज़ पर की गई छापेमारी के बाद अपराध क्रमांक 94/2021 दर्ज किया। इस जांच की निगरानी समीर वानखेड़े कर रहे थे, हालांकि उसी दौरान एनसीबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सक्रिय रूप से जांच को निर्देशित और पर्यवेक्षित किया। बाद में वानखेड़े पर प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए, जिसके आधार पर विशेष जांच दल का गठन किया गया।एसईटी का गठन और पक्षपात के आरोपविशेष जांच दल ने जून 2022 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।


समीर वानखेड़े ने इस जांच को कैट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि जिस अधिकारी ने एसईटी का नेतृत्व किया, वही संबंधित जांच में पहले से सक्रिय रूप से शामिल था, अतः वह “अपने ही मामले में न्यायाधीश” नहीं बन सकता।कैट ने प्रारंभिक स्तर पर इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की थी कि संबंधित अधिकारी जांच में प्रत्यक्ष रूप से शामिल था, इसलिए उसका एसईटी का सदस्य होना उचित नहीं था।
अधिकरण ने यह भी उल्लेख किया कि व्हाट्सएप संदेशों से स्पष्ट होता है कि उक्त अधिकारी न केवल जांच का निर्देशन कर रहा था, बल्कि पूरे कार्रवाई की योजना भी वही बना रहा था।कार्यवाहियों की श्रृंखला और कथित उत्पीड़नन्यायिक टिप्पणियों के बावजूद, एसईटी की रिपोर्ट को गृह मंत्रालय और फिर सीबीआईसी को भेजा गया तथा उसके आधार पर मुख्य दंड की विभागीय कार्यवाही हेतु मसौदा आरोप-पत्र तैयार किया गया।
समीर वानखेड़े का आरोप था कि यहीं से उनके विरुद्ध लगातार उत्पीड़न की प्रक्रिया शुरू हुई।वर्ष 2023 में एसईटी की सामग्री के आधार पर सीबीआई ने उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की और उनके आवास पर तलाशी ली, जिसमें कोई भी आपत्तिजनक सामग्री प्राप्त नहीं हुई। इसके पश्चात बॉम्बे उच्च न्यायालय ने उन्हें दमनात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया और बाद में उनकी याचिका स्वीकार करते हुए यह दर्ज किया कि मामले में “विचारणीय प्रश्न” मौजूद हैं।
इसी दौरान, विभागीय स्तर पर भी कई नोटिस और जांचें प्रारंभ की गईं, जिसके चलते वानखेड़े को पुनः कैट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। ओए संख्या 1033/2024 में कैट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि प्रारंभिक जांच, जिसमें एसईटी भी शामिल है, से एकत्र साक्ष्यों का उपयोग भविष्य की किसी भी विभागीय कार्यवाही में नहीं किया जाएगा।
● आरोप-पत्र जारी होना और कैट की रोक
इन स्पष्ट निर्देशों और बॉम्बे उच्च न्यायालय में लंबित आपराधिक कार्यवाही के बावजूद, सीबीआईसी ने 18 अगस्त 2025 को आरोप-पत्र संख्या 30/2025 जारी कर दिया। यह आरोप-पत्र उन्हीं सामग्रियों पर आधारित था, जो न्यायालय में विचाराधीन थीं और प्रारंभिक जांच का हिस्सा थीं।
कैट ने अंतरिम आदेश में विभागीय कार्यवाही पर रोक लगाते हुए कहा कि आरोप-पत्र का आधार ही न्यायिक समीक्षा के अधीन है।अंतिम निर्णय और अधिकरण की टिप्पणीसभी पक्षों की दलीलें सुनने तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार त्वरित सुनवाई के बाद, कैट ने 19 जनवरी 2026 को अपना अंतिम निर्णय सुनाया।
अधिकरण ने दोहराया कि यह स्थापित विधि सिद्धांत है कि प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को विभागीय जांच में आरोपित नहीं किया जा सकता।कैट ने दिल्ली उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष विभागीय आरोप तय करने के लिए उपयोगी नहीं हो सकते।
अधिकरण ने पाया कि सीबीआईसी ने बिना स्वतंत्र विवेक का प्रयोग किए, मात्र औपचारिकता निभाते हुए और न्यायिक निर्देशों की अवहेलना करते हुए कार्यवाही की।परिणामस्वरूप, कैट ने आरोप-पत्र को निरस्त कर दिया और एसईटी रिपोर्ट के आधार पर प्रारंभ की गई विभागीय कार्यवाही का अंत कर दिया।
● वाद विवरणवाद शीर्षक:
समीर दयानंद वानखेड़े बनाम भारत संघवाद संख्या:
ओ.ए. संख्या 3258/2025
निर्णय तिथि: 19 जनवरी 2026
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: अजयेश लूथरा
प्रतिवादी के अधिवक्ता: रवि प्रकाश, वरिष्ठ अधिवक्ता


