डॉ अम्बेडकर की राजनीतिक ताकत गाँधी जी से अधिक है!

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डॉ रवि रमेशचंद्र (एसोसिएट प्रोफेसर,,अंतराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली)/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

21वी सदी के भारतीय भारतीय लोकतंत्र में कोई भी नेता, दार्शनिक, समाजसुधारक तभी पूजा जएगा जब उनका वोट बैंक की राजनीतिक महत्व होगा। संवैधानिक और नैतिक ताकत के रूप में हर भारतीय के मानस में डॉ भीमराव रामोजी ( बाबासाहेब ) आंबेडकर और मोहनदास करमचंद (महात्मा) गांधी हमेशा व्याप्त रहेगें। डॉ आंबेडकर ने भारतीय राजनीति को समानता और संविधानवाद की दृष्टि दिया, तो महात्मा गांधी ने नैतिक बल और अहिंसा ।

संक्षेप में कहें तो यही चारों मंत्र प्राचीन काल से ही पूर्वी और पश्चिमी जगत की राजनीति के मुख्य स्तंभ हैं; जिसपर लोकतांत्रिक राज्यों की इमारतें साकार हुई हैं। लेकिन बाजारवाद और सत्ता केंद्रित राजनीति ने नैतिक बल और अहिंसा के मूल्यों को कमजोर किया है। क्योंकि ये धीमी गति से लंबे समय में परिणाम देने वाले कारक हैं। वहीं संविधान और सत्ता के नियम तुरंत न्याय और राजनीतक सत्ता की सीढ़ी का काम कर रहा है। इसीलिए वर्तमान में और आने वाले भविष्य में डा अम्बेडकर की राजनीतिक ताकत गांधी जी से बड़ी साबित होती दिख रही है। इसकी मुख्य वजह है उन विषयों की प्रासंगिकता, जिनके लिए वे जिए।

भीमराव रामजी आम्बेडकर, डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आन्दोलन को प्रेरित किया और अछूतों से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था।इसलिए डॉ अम्बेडकर वर्तमान राजनीतिक महत्व की दृष्टि से महात्मा गांधी से बड़े होते दिखाई देते हैं। आने वाले दशकों में राजनीतिक ताकत डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर, नैतिक ताकत महात्मा गांधी को बहुत पीछे छोड़ देंगें। 156 साल के गांधी, आज 136 साल के अम्बेडकर के सामने अपनी राजनीतिक साख खोते जा रहे हैं। उनके जाने के 70 साल बाद, भारतीय राजनीतिक दलों और नेताओं ने उनके अनुयायियों को न्याय और अधिकार दिलाने के नाम पर अपना निजी वोट बैंक बनाने में जुटे हैं।

वोट बैंक की राजनीति के दौर में गांधीजी वोट बैंक नहीं रहे, जबकि बाबासाहेब लगातार एक मजबूत राजनीतिक मुद्रा बनते जा रहे हैं। गांधी जी भले ही देश की नोट पर छपे हैं, लेकिन बाबा साहेब के सामने उनका राजनीतिक अवमूल्यन होता जा रहा है। इसके लिए उनके लक्ष्य, कार्य, उद्देश्य और परिणाम देने की क्षमता है। गांधी जी एक नैतिक ताकत वाली राजनीति के प्रतीक हैं। जबकि बाबा साहेब एक सामाजिक विद्रोह वाली राजनीति के पोषक हैं। इसे हमें विस्तार से समझना होगा। दोनो महान नेताओं ने देश और समाज हित के लिए कष्ट सहे। बस फर्क इतना था कि दलितों के लिए गांधी जी के कार्य उनकी सुहानुभूति और मानवीय मूल्यों से प्रेरित थे, जबकि बाबा साहब के कार्य स्व- अनुभूति औऱ अन्याय के विरुद्ध संघर्ष से प्रेरित थे।

गांधी जी का जीवन और संघर्ष बाबा साहब की अपेक्षा आसान था। इसलिए भी हम बाबा साहब के कार्यो और शब्दों में पीड़ा के साथ ही, ऊंची जातियों के प्रति घोर कड़वाहट देखने को मिलती है। किंतु बाबा साहब स्वयं कहते थे, उनका विरोध ब्राह्मणों से नहीं, ब्राह्मणवाद से है। उनके शिक्षक ( गुरुजी ने ही अपना अंबावडे उपनाम डॉ अम्बेडकर को दिया था। मूल उपनाम सकपाल था), उनके डॉ कुलकर्णी थे, उन्होंने दूसरी शादी एक ब्राह्मण महिला से किया था। उन्हे बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ और सोलापुर के छत्रपती से छात्रवृती भी मिली थी। अतः वे ब्राह्मणों के खिलाफ न होकर, उस मानसिकता के विरोधी थे जिससे शोषण, छुआछूत और रूढ़िवाद की सत्ता पनपती है।

गांधी जी विश्व व्यक्ति औऱ बाबा साहेब संस्था हैं:महात्मा गांधी के जीवन और कार्य मुख्यतः नैतिक बल और अहिंसा के इर्द गिर्द रहा है। उन्होंने प्रमुख धर्म ग्रथों का अध्ययन किया। सनातन धर्म और ईसाईयत का उनके ऊपर काफी प्रभाव पड़ा था। दूसरे की आत्मा जगाने के लिए खुद पीड़ा सहन करने के जीसस क्राइस्ट के सिद्धांत के पक्के समर्थक थे। गांधी जी व्यक्तिके मन में बदलाव लाकर दुनिया बदलने में विश्वास रखते थे। इसीलिए उन्होंने आत्म शुद्धि पर विशेष जोर दिया। बाबा साहेब अंबेडकर का जीवन और कार्य ज्ञान से उपजी शक्ति संचालित विद्रोह के बल के इर्द गिर्द रहा है। उन्होंने भी हिन्दू धर्म समेत विश्व के सभी धर्मों और दर्शन को गहराई से जाना। लेकिन बे सबसे ज्यादा महात्मा बुद्ध और गुरु नानक देव के दर्शन से प्रभावित हुए थे। उनका रास्ता संस्थाओं और कानून में बदलाव के माध्यम से समाज में अधिकृत परिवर्तन लाना था। आत्म शुद्धि से ज्यादा महत्व सत्ता और कानून को दिया। उनके अनुसार इन्हीं माध्यमों से सदियों से पीड़ित और शोषित तथाकथित अछूत वर्ग न्याय और भागीदारी प्राप्त कर सकता था।

गांधी जी का मार्ग लंबा है, कठिन है, कष्टदायक है, लेकिन परिणाम निश्चित और लंबे समय तक कायम रहने वाला है। सत्य, अहिंसा और नैतिक मूल्यों का प्रयोग कम हो सकता है, लेकिन महत्व कभी खत्म नहीं होगा। गांधी जी ने सारे देश और हर जाति, धर्म, वर्ग के लिए संघर्ष किया। लेकिन आज़ादी के बाद हर समुदाय का अपना नेतृत्व पैदा होने लगा। इससे आज़ादी के पहले जिस नैतिक बल को सबसे मजबूत हथियार माना जाता था, उसे आज़ादी के बाद कबाड़ में पड़ी वस्तु की तरह देखा गया। बाबा साहेब ने दलितों, अछूतों और शोषितों की समस्या का नेतृत्व किया। उन्हे आवाज दिया। शक्ति दिया। लड़ने का आत्मविश्वास दिया। उन्होंने नैतिकता को और विस्तृत बनाते हुए, अनैतिक शोषण पर प्रश्न चिन्ह लगाया।

■ क्यों बाबा साहेब – गांधी जी से बड़े होंगे?

1970 के बाद भारतीय राजनीति जाती और धर्म पर आधारित वोट बैंक की राजनीति के प्रभाव में आ गयी। इसमें प्रांतवाद और भाषा भी एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरा। इसके चलते ध्रुवीकरण की राजनीति बढ़ी। इस राजनीति को चलाने के लिए जाती -धर्म की गुटबंदी काम आयी, जो गांधीवादी मूल्यों के विपरीत थी। साथ ही कोई भी गांधीवादी झंडा उठाने को तैयार नहीं है। स्वयं इंदिरा गांधी ने सबसे पहले गांधीजी के सिद्धांतों को तिलांजलि देकर अपातकाल लागू किया था। मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति की जगह, येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की होड़ लग गयी। राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण भी तेजी से हुआ। इसलिए गांधीवादी मूल्यों के सहारे चुनावी राजनीति कठिन हो गयी। दूसरी ओर जातिवाद, आरक्षण की मांग और दलित समाज की राजनीति में सीधी सहभागिता से सत्ता में भागीदारी बढ़ी। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के जरिये दलित और आदिवासी समाज मुखर होकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तलाशने लगा।

उन्हे डीएमके, बसपा, तेलगुदेशम, और रिपब्लिकन पार्टी जैसे नए विकल्प मिलने लगे जो बाबा साहब के विचारों के अधिक नजदीक थे। इसलिए भी डॉ आंबेडकर का नाम अधिक सत्ता सुलभ और वोट आकर्षक बनता गया। गाँधीजी का वोट आकर्षण फीका पड़ता गया।क्या बाबा साहब की ताकत गाँधीजी से अधिक है?इसे समझना बहुत ही आसान है। अक्सर देखा गया है कि लोग महात्मा गांधी की खुल कर निंदा करते हैं, उन्हे अपशब्द भी कहते हैं। उनकी आलोचना लिखित, मौखिक रूप में प्रसार माध्यमों में फैलाई जाती है। लेकिन शायद ही कोई मजबूत विरोध होता है। मेरे हिसाब से यही गांधी जी की ताकत भी है कि उन्हें कोई भी गाली दे सकता है। इतने सहज हैं गांधी। पानी की तरह बैरंग। सबके अपने अपने रूप में हैं गांधी। इसलिए शायद इसीलिए वे कोई मजबूत वोट बैंक का स्रोत नहीं बन पाए। इसके ठीक उलट यदि कोई भी बाबा साहब के प्रति किसी भी लिखित या मौखिक रूप में कोई बात या अपशब्द या आलोचना करे तो इसे हिंसक विरोध, एट्रोसिटी एक्ट, जेल, अदालत और सजा भुगतनी पड़ सकती है।

उनकी मूर्ति या प्रतिनिधि चिन्हों के किसी भी तरह के अपमान पर देश जल उठता है। तोड़ फोड़ मच जाती है। इससे साबित होता है कि बाबा साहेब राजनीतिक रूप से महात्मा गांधी से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। क्योंकि हर राजनीतिक दल 17 प्रतिशत शेड्यूल कास्ट और 8 प्रतिशत शेड्यूल ट्राइब और अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समाज को अपना वोटर बनाना चाहता है। लेकिन नैतिक बल (जिसका महत्व नेता, दल और विचारशून्य समाज त्यागता जा रहा है) के मामले में आज भी गांधी जी बेजोड़ हैं। वर्तमान में भाजपा भी डॉ आंबेडकर के विचारों को आत्मसात करके अपनी राजनीतिक रणनीति में डा अम्बेडकर की केंद्र बिंदु बना रही है। इसके साथ ही महात्मा ज्योतिबा फुले के माध्यम से जाति केंद्रित ओबीसी ध्रुवीकरण बढ़ेगा। सवर्ण जातियाँ दिशाहीन होकर अपना राजनीतिक महत्व खो देंगी। इन्ही कारणों से आने वाले दशकों में डॉ आंबेडकर की राजनीतिक ताकत और प्रासंगिकता, गांधी जी से कई गुना बढ़ सकती है।

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