मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में मराठी माध्यम के स्कूल बंद होने की स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन गई है। मराठी स्कूलों के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस और प्रभावी प्रयास होते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। सरकार की इस उदासीनता का सीधा असर छात्रों पर पड़ा है और बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में दाखिला दिलाने को मजबूर हो रहे हैं। इसके चलते मराठी स्कूलों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।इसी पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने मराठी भाषा और मराठी माध्यम के स्कूलों की अनदेखी किए जाने के मामले में राज्य सरकार की कड़ी शब्दों में फटकार लगाई है।


न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि मराठी राज्य की राजभाषा और मातृभाषा है, ऐसे में उसके संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। इसके बावजूद यदि मराठी स्कूल एक-एक कर बंद हो रहे हैं, तो यह शासन की विफलता को दर्शाता है।न्यायालय ने यह भी चिंता जताई कि केवल कम छात्र संख्या का हवाला देकर मराठी स्कूलों को बंद करना उचित नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह मराठी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने, आवश्यक शिक्षक नियुक्त करने, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और अभिभावकों में विश्वास पैदा करने के लिए ठोस नीति बनाए।
अदालत ने कहा कि भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए शिक्षा सबसे मजबूत माध्यम है और यदि मराठी शिक्षा व्यवस्था कमजोर होगी, तो इसका दूरगामी नकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ेगा।हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और मराठी स्कूलों को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही यह भी कहा कि केवल अंग्रेज़ी माध्यम को बढ़ावा देकर मराठी भाषा को हाशिये पर डालना स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी के बाद अब यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकार मराठी स्कूलों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।


