मुंबई वार्ता संवाददाता
एडवोकेट अमोल मतेले प्रवक्ता एवं मुंबई अध्यक्ष, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार ) ने कहा कि ,”मुंबई विश्वविद्यालय की स्थिति को देखते हुए, यह कहावत बिल्कुल सत्य है कि “न घर, न किनारा”। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उपलब्ध कराए गए ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा के अवसरों का उपयोग करने के बजाय, विश्वविद्यालय प्रशासन बस “सो रहा है”।”
उन्होंने कहा कि मूर्ति विभाग, जो कभी 80,000 छात्रों को आकर्षित करता था, आज घटकर मात्र 24,000-25,000 प्रवेशों तक रह गया है। यह तो ‘गावला गांव में एक बैल मर गया’ जैसी स्थिति हो गई है। छात्रों की संख्या इतनी तेजी से घट रही है कि कुलपति और प्रतिकुलपति की भूमिका “एक आलसी काम” की तरह प्रतीत होती है। मुंबई विश्वविद्यालय की विफलता यूजीसी द्वारा प्रदान की गई सुविधाओं का पूर्ण उपयोग करने में विफलता है। पुराना पाठ्यक्रम और सुधार प्रक्रिया का अभाव। छात्रों को समय पर परिणाम न मिलना और तकनीकी सेवाओं का अभाव। यह अत्यंत गंभीर बात है कि इतनी आधुनिक तकनीकी सुविधाएं होने के बावजूद विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है। प्रशासन को “पैरों के नीचे की रेत” को पहचान कर तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने मांग की है कि कुलपति और प्रो-कुलपति को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और उनकी जांच की जानी चाहिए। ऑनलाइन शिक्षा और पाठ्यक्रम को अपडेट करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। छात्रों की समस्याओं का तत्काल समाधान किया जाना चाहिए। मुंबई विश्वविद्यालय सिर्फ एक शैक्षणिक संस्थान नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य की नींव है। प्रशासन को यह कह कर अपनी विफलता नहीं छिपानी चाहिए कि, “यदि आप आंगन को झुकाएंगे तो आप नृत्य नहीं कर सकते।” यदि अभी सुधार नहीं किया गया तो विश्वविद्यालय का गौरवशाली इतिहास हमेशा के लिए “अंधकार के गर्त” में खो जाएगा।


