मुंबई वार्ता/सतीश सोनी

ईडी के अधिकारियों ने कुछ दिन पहले वसई विरार नगर आयुक्त अनिल कुमार पवार के आवास पर छापा मारा था। यह कार्रवाई २९ जुलाई को की गई थी। धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) २००२ के तहत मुंबई, पुणे, नासिक और सतारा में १२ जगहों पर छापेमारी की गई। इस कार्रवाई में १.३३ करोड़ रुपये नकद, कई संपत्तियों के दस्तावेज़, बैंक जमा पर्चियाँ और डिजिटल उपकरण ज़ब्त किए गए हैं।


गौरतलब है कि अनिल पवार के वीवीसीएमसी में आयुक्त का पदभार संभालने के बाद बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की बात सामने आई है। ईडी की जाँच में यह भी पता चला है कि किसी भी परियोजना की अनुमति देते समय वह २०-२५ रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से शुल्क लेते थे, जबकि शहरी नियोजन के उप निदेशक का कमीशन १० रुपये प्रति वर्ग फुट था।यह कार्रवाई वीवीसीएमसी घोटाला मामले में जयेश मेहता, वाई.एस. रेड्डी और अन्य के खिलाफ की गई है।


ईडी की जाँच से पता चला है कि अनिल पवार और अन्य अधिकारी २००९ से वसई-विरार नगर निगम सीमा में अवैध व्यावसायिक इमारतों के निर्माण में शामिल थे। वीवीसीएमसी के अधिकारियों की मिलीभगत से निर्माण परमिट प्राप्त करने के लिए बड़ी मात्रा में काले धन का इस्तेमाल किया गया था। इस मामले में आगे की जाँच जारी है और अधिक आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होने की संभावना है।
बेनामी कंपनियाँ बनाई गईं। इससे काले धन की हेराफेरी हुई। छापेमारी के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों के अनुसार, अनिल पवार ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर कई बेनामी कंपनियाँ बनाई थीं। संदेह है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के माध्यम से प्राप्त धन को इन कंपनियों में डायवर्ट किया। यह पता चला कि इन कंपनियों का उपयोग मुख्य रूप से आवासीय टावरों, गोदाम निर्माण और पुनर्विकास के लिए किया गया था । सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और डंपिंग ग्राउंड के लिए आरक्षित भूमि पर ४१ अनधिकृत इमारतों का निर्माण किया गया था। जिसकी जानकारी होने के बावजूद, बिल्डरों ने आम नागरिकों के साथ धोखाधड़ी करके वहाँ इकाइयाँ बेचीं।
८ जुलाई, २०२४ को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन सभी इमारतों को गिराने का आदेश दिया था। इमारतों पर तोड़फोड़ की कार्रवाई २० फरवरी, २०२५ को पूरी हुई। शक है कि पवार ने खुद इन सभी इमारतों को अवैध रूप से बनाने की अनुमति दी थी। ईडी के संज्ञान में यह भी आया है कि उन्होंने इनसे करोड़ों रुपये वसूले। इससे पवार पर शिकंजा और कसेगा।


