शिकाकाई और रीठा है बाजार के शैंपू से बेहतर(स्कूली छात्र ने किया अध्ययन)।

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मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र के ठाणे जिले स्थित 9 वीं कक्षा के छात्र ओग डफलापूरकर ने अपने स्कूल के प्रोजेक्ट में शिकाकाई व रीठा के मुकाबले बाजार में उपलब्ध शैंपू की गुणवत्ता और उसके प्रभाव जैसे आज के दौर के महत्वपूर्ण विषय पर अध्ययन कर चौंकाने वाली जानकारी दी है। उनके अध्ययन के अनुसार बाजार में उपलब्ध कुछ कृत्रिम चीजों से बने शैंपू और बालों को चमकाने वाली अन्य प्रसाधन सामग्री अल्कलाइन पी.एच. के होते है जो कई बार बालो को और त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकते है।

अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने 15 से 40 वर्ष आयु वर्ग के लगभग पांच सौ लोगों से संवाद किया और इस संदर्भ में जानकारी इकट्ठा की साथ ही त्वचा रोग विशेषज्ञों, आयुर्वेदिक चिकित्सकों और सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग करने वाले सौंदर्य विशेषज्ञों से भी चर्चा की। छात्र ओग डलापुरकर ने अपने अध्ययन के लिए पी.एच. एनालिसिस, बॅक्टेरिया कल्चर के स्टैंडर्ड को भी जानने की कोशिश की है। अपने सर्वे के दौरान अधिकतर लोगों ने बालो का रुखापन, बालों का जल्दी झडना, सिर की त्वचा में रूसी इत्यादी की समस्याओं और उपचार के बारे में जानकारी दी।

ओग का कहना है कि बाजार में उपलब्ध अनेक शैंपू में सल्फेट, पैराबेन्स, फोर्मेल्ड़ेहेड्स, सुगंध आदि का प्रयोग होता है ये चीजें कई बार मनुष्य शरीर को तो नुकसान पहुंचाती ही है साथ ही पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है। ये तत्व जलाशय, नदी तथा समुद्र के पानी में प्रदूषण का स्तर बढ़ाते है जिससे जलीय जीवों को भी नुकसान होता है, उनकी प्रजनन क्षमता कम होती है तथा श्वसन में भी बाधा आती है।

उनका कहना है कि शिकाकाई और रीठा जैसी प्राकृतिक चीजों से बाल धोने पर बालों का रूखापन, रुसी खत्म हुई और बालों का झड़ना भी कम हुआ है।शिकाकाई और रीठा मिश्रण को आसानी से घर में ही बनाया जा सकता है। हर बार ताजा मिश्रण बनाने के वजह से इसको सुरक्षित रखने के लिए इसमें बाहरी रसायनों को भी मिलाने की आवश्यकता नहीं है। इसका स्रोत पेड़ों से होने की वजह से ये इस्तेमाल होने के बाद शत प्रतिशत बॉयोडिग्रेडेबल है इसीलिए इसका पर्यावरण पर भी कुप्रभाव नहीं पड़ता है यह प्राकृतिक उपाय सदियों से हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है और आयुर्वेद में इसको बहुत अच्छा माना गया है।

पर्यावरण को बचाने के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।ओग डफलापूरकर के इस स्टडी प्रोजेक्ट पर उनके विद्यालय श्रीमती सुलोचना देवी सिंघानिया स्कूल तथा दोस्तों ने बधाई दी है।

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