ज्ञानेंद्र मिश्र/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

ऑपरेशन सिंदूर में भारत की विजय का परचम पूरी दुनिया में लहरा रहा है—हाँ, बिल्कुल! सही कह रहा हूँ। हर व्हाट्सएप ग्रुप में दो-चार लोग, भारत की विजय का परचम लिए, सुबह से शाम तक भारत सरकार के अमेरिका द्वारा औचक युद्धविराम की घोषणा के बाद युद्धविराम के निर्णय को स्वीकार किए जाने के कारण भारत की अंतरराष्ट्रीय पटल पर बढ़ी हुई प्रतिष्ठा का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं।इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय सेना ने अपने शौर्य और पराक्रम से सदा भारत का स्वाभिमान और प्रतिष्ठा बनाए रखा है। यह घोषणा न भी हुई होती या यह युद्ध न भी हुआ होता, तब भी भारतीय सेना पर यह भरोसा भारत से प्रेम करने वाले जन-जन के हृदय में सदा के लिए कायम है।
नगाड़ा लेकर घूम-घूमकर डुग्गी बजाने की आवश्यकता नहीं कि भारत विजयी हुआ, भारत विजयी हुआ और भारतीय सेना ने विजय प्राप्त की।
● कोई आवश्यकता नहीं—सफलता, विजय और पराक्रम के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती। ये स्वयं उगते सूरज की तरह दृष्टिगोचर होते हैं।
भारतीय सेना तो निश्चित रूप से विजयी हुई, परंतु… भारतीय जनमानस और भारतीय जनमानस द्वारा चुना हुआ नेतृत्व?
● लोकतंत्र और जनमानस की शक्ति
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मत सबसे महत्वपूर्ण होता है—चाहे गधे का हो या घोड़े का, हर मतदाता का मत समान मूल्य रखता है। मतदाता का जो विचार होता है, वही मतदान में परिवर्तित होकर परिणाम में प्रतिबिंबित होता है। अतः जनमानस की दृष्टि, जनभावना और जनविचार को नजरअंदाज करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में पाँव पर कुल्हाड़ी मारने के समान है।यदि राष्ट्र के संचालन की व्यवस्था यही सामान्य मतदाता कर सकता है, तो अन्य विषयों पर उसके विचार को स्वीकार्यता, मान्यता और सम्मान क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
आज सामान्य जनमानस अधिकतर संख्या में सकते में है, ठगा-सा महसूस कर रहा है। नेतृत्व से निकट संबंध रखने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी इन सामान्य बुद्धि वाले राष्ट्रवादियों को वर्तमान भारतीय नेतृत्व के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में अभूतपूर्व सफलता की घुट्टी पिलाने में लगे हैं। पता नहीं क्यों इतनी मेहनत करनी पड़ रही है, जबकि यह शाश्वत सत्य है कि प्रेम, सफलता और खुशी किसी भी स्थिति में कभी छिपाए नहीं छिपते।
● पहलगाम नरसंहार से युद्धविराम तक: क्या हुआ?
22 अप्रैल को निहत्थे भोले हिंदू यात्रियों को कश्मीर के विशेष पर्यटक स्थल पहलगाम में एक-एक से उनका धर्म पूछकर, कलमा पढ़वाकर, पैंट भी उतरवाकर, पूरी तसल्ली के साथ यह सुनिश्चित करने के बाद कि मरने वाला व्यक्ति हिंदू ही है, उनकी पत्नी और बच्चों के सामने न्रृशंस हत्या कर दी गई।यह विभत्स घटना भारतीय सीमा के अंदर तकरीबन 200 किलोमीटर भीतर घटी—सीमावर्ती क्षेत्र में कतई नहीं थी। साफ-साफ हमें, आपको, सबको यह दिख रहा था कि यह हमारे घर के अंदर से ही किया गया दुर्दांत हत्याकांड है।उसी दिन सरकार ने बिना किसी प्रारंभिक जाँच के पाकिस्तान का नाम ले लिया। संभवतः इतनी विकराल दुर्घटना और ऐसे नरसंहार के लिए अपने सूचना तंत्र की असफलता को स्वीकार करना सरकार के लिए घातक सिद्ध हो सकता था। जनमानस का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान से बढ़िया बलि का बकरा कोई नहीं हो सकता था।सब कहते हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों का घर है, वहीं से सारे आतंकवादी आते हैं, इसलिए पाकिस्तान ऐसी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार है और उस पर आक्रमण किया गया। इसी तर्क पर, पाकिस्तान ने तो स्वीकार किया है कि वह अमेरिका के लिए प्रशिक्षण दे रहा है 30 वर्षों से। तो अमेरिका को साफ-साफ जिम्मेदार माना जाना चाहिए आतंकवादी घटनाओं के लिए। आतंकवादियों के हाथों में रूस या तुर्की के हथियार हैं, तो तुर्की, रूस और अमेरिका को जिम्मेदार मानते हुए उन पर आक्रमण करना चाहिए था। क्यों नहीं किया? क्योंकि पाकिस्तान सबसे आसान शिकार लगा सरकार को।*उपेक्षित अवसर और जनमानस की अपेक्षाएँ*सरकार के पास पूरा अवसर था, पूरी छूट थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनमानस का विचार ही मायने रखता है। पूरे भारत का जनमानस आपके साथ था। इस आपदा को अवसर में बदलते हुए कश्मीर के साथ-साथ पूरे भारत में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और अवैध प्रवासियों को चिह्नित कर त्वरित गति से, यदि भारत से निकाल नहीं सकते थे, तो कम-से-कम चिह्नित तो कर सकते थे।साथ ही यह सोचना चाहिए कि यदि आतंकवादी पाकिस्तान से आए हैं, तो तकरीबन छह महीने जंगलों में चले होंगे, पूरे कश्मीर में चले होंगे, पहलगाम तक पहुँचने के लिए। सैकड़ों घरों में रुके होंगे, तकरीबन 150 से 200 रातें किन्हीं लोगों के घरों में बिताई होंगी, सैकड़ों लोगों के साथ भोजन किया होगा। अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए सरकार को इन दोषियों को—पहलगाम से लेकर पाकिस्तान की सीमा तक के बीच जितने भी आतंकी समर्थक चिह्नित किए जाते—उन्हें समाप्त करते चले जाना चाहिए था।इसी के समानांतर पूरे भारत में रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानियों को चिह्नित करने का कार्य सतत रूप से, द्रुत गति से चलते रहना चाहिए था।
● मुस्लिम समाज का विरोध: सच्चाई या दिखावा?
खैर, पूरे भारत में एक दूसरी नौटंकी भी शुरू हुई। पूरे भारत का मुस्लिम समाज और तमाम नेता पहली बार एक साथ आतंकियों और इस नरसंहार के खिलाफ एकजुट दिखाई दिए। जानते हैं क्यों? क्योंकि अबकी बार, पहली बार, आतंक का धर्म पता चल गया था। इन सभी के अंदर क्रोध इस दुर्घटना के लिए नहीं भरा था। इस दुर्घटना ने उन्हें नंगा कर दिया। इतनी लापरवाही से इस नरसंहार को क्यों अंजाम दिया गया—इस बात का क्रोध इनके मन में था। इसलिए इन्होंने आतंकी घटना और आतंकवादियों का विरोध इतने मुखर स्वरों में किया। हिंदुओं के चिह्नित कर मारे जाने के प्रमाण मिलने के साथ कश्मीर के पर्यटन व्यवसाय की रीढ़ की हड्डी टूटने के पूरे आसार तैयार हो गए। जिसे कश्मीर बर्दाश्त नहीं कर सकता था, इसलिए उन्हें, दिखावे के लिए ही सही, बाहर निकलना पड़ा।क्या इतनी सामान्य-सी समझ हममें, आपमें और सरकार में बैठे बुद्धिजीवियों को नहीं है? क्या छह महीने तक आतंकियों ने कश्मीर का भ्रमण किया, पहलगाम आने तक दो-ढाई सौ किलोमीटर की यात्रा बिना किसी सहयोग के, बिना किसी की जानकारी के पहलगाम तक पहुँचकर ऐसी वारदात को अंजाम दे सके? कत्तई विश्वास नहीं होता।
● युद्ध का परिणाम: क्या हासिल हुआ?
तो अब युद्ध शुरू कर दिया—विपक्ष के दबाव में, जनता-जनार्दन के दबाव में, बिना किसी तैयारी के। हासिल क्या रहा इसका? भारत को क्या मिला? जो आतंकवादी शिविर नष्ट किए गए, वे फिर से बन जाएँगे।भारत को सबसे वांछित आतंकवादी के बाल-बच्चे-बीवियाँ मिले, मगर आतंकवादी नहीं मिले। न ही उसे पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) मिला, और न ही बलूचिस्तान की स्वतंत्रता मिली—जो आज ठगा-सा महसूस कर रहा होगा। उसे क्या मिला?भारत ने एक राफेल खोया है। अपने सुरक्षा यंत्रों पर पुनर्विचार करना होगा। तीन दिन के संघर्ष के बावजूद पाकिस्तान का क्या नुकसान हुआ, इसके प्रमाण अब तक प्राप्त नहीं हो सके।युद्धविराम अमेरिका ने करवाया, पहले घोषणा अमेरिका ने की।
यह घटना तो कश्मीर में घटी थी। कश्मीर में तो हम किसी की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करते, तो फिर यह अमेरिका घुसा कैसे? और हमारी सरकार ने ऐसा करने की इजाजत कैसे दी और क्यों दी? कश्मीर को पंडित नेहरू यूनाइटेड नेशंस ले गए थे, मगर वर्तमान भारत ने अपनी नीतियों के विरुद्ध इसे अंतरराष्ट्रीय पटल पर क्यों रखा? अमेरिका को इसका हिस्सा क्यों बनने दिया?
● पहलगाम नरसंहार का बलिदान: क्या अर्थ रहा?
इस संघर्ष के बाद हमारे पास शून्य बचा है। सिंधु नदी का पानी भी अंततः अंतरराष्ट्रीय दबाव में फिर से बहने लगेगा।खैर, क्या हमारे नेतृत्व ने ट्रम्प से यह गारंटी ली है कि पाकिस्तान फिर से आतंकवाद में शामिल नहीं होगा?जनमानस की जो अपेक्षा थी, वह इतनी ही थी कि किसी भी प्रकार से आप अपनी जल, स्थल, नभ सेनाओं का केंद्रीकृत उपयोग करते हुए पाकिस्तान के सभी सैनिक ठिकानों और आतंकी अड्डों को पूरी तरह नष्ट कर देते तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को एक डिमिलिटराइज्ड जोन बना देते। इतने मात्रा से ही बलूचिस्तान और सिंध के निर्माण का मार्ग भी खुल जाता और भारत सीपेक(सी-पीईसी) में प्रबल बाधा पैदा कर चीन को एक बड़ा झटका दे सकते में कामयाब हो सकता था- बस इतना काफी होता भारत को आतंकवाद से—ध्यान दीजिए—बाहरी आतंकवाद से अगले 20 साल तक बचे रहने और विकास की ओर अग्रेषित होने का अवसर प्राप्त करने के लिए।
● युद्ध-विराम के पीछे की संभावित वजहें
मैं कुछ वजहें मानता हूँ, जो इस युद्धविराम में कारक सिद्ध हुई होंगी। भारत के निकटतम मित्र—रूस और इजरायल—दोनों इस वक्त अपनी-अपनी मुसीबतों में फँसे हैं। भारत को इनसे न तो खुफिया सूचनाएँ और न ही किसी प्रकार की मदद या सलाह समय पर प्राप्त हो रही होगी, जिसके कारण उनकी आक्रमण क्षमता निष्प्रभावी या कम प्रभावी हो रही होगी। साथ ही, अमेरिका ने भारत को सहयोग के नाम पर मात्र तटस्थता का लॉलीपॉप दिया होगा, जिसने भारत सरकार को—चलो, मान लिया कि पाकिस्तान सरकार ने ही युद्धविराम की माँग रखी होगी—युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया होगा।
●ॐजनमानस का आक्रोश और भविष्य
भारत सरकार का यह निर्णय अधिकतर जनमानस को अपेक्षा के विपरीत और अस्वीकार्य लगा है। अधिकांश लोग ठगा-सा महसूस कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि विजय के मुँह से पराजय छीनकर लाई गई है। इसका परिणाम आने वाले समय में, जैसे कि बिहार चुनाव में, दिखाई दे सकता है।*मगर एक राष्ट्रवादी, राष्ट्रप्रेमी और हिंदू हित में निहित राष्ट्रहित का पक्षधर होने के नाते मैं हृदय से चाहता हूँ कि मेरा यह विश्लेषण आने वाले समय में पूरी तरह गलत सिद्ध हो। ईश्वर से सिर्फ इतनी ही प्रार्थना है।


