मुंबई वार्ता/सतीश सोनी

मुंबई महानगर क्षेत्र में पिछले १५ सालों में लोकल ट्रेन हादसों में हुई मौतों में से एक तिहाई लाशें लावारिस रह गई हैं, यह बात एक आरटीआई से सामने आई है।


जीआरपी के अथक प्रयासों के बावजूद कई शव उनके परिजनों तक नहीं पहुंच पाते या कोई उनका दावा करने आगे नहीं आता। रेल दुर्घटनाओं में हुई ४६,९६९ मौतों में से ३१ प्रतिशत अर्थात १४,५१३ शव लावारिस के रूप में दर्ज किए गए हैं।
हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सरोश मेहता द्वारा प्राप्त आरटीआई रिपोर्ट के अनुसार, २०१९ से रेल दुर्घटनाओं में लावारिस शवों की संख्या में वृद्धि हो रही है। रेल दुर्घटनाओं में शवों की पहचान करना अक्सर बहुत मुश्किल होता है। कई बार शवों की हालत इतनी खराब होती है कि उनकी पहचान नहीं हो पाती। पुलिस अधिकारी ने कहा कि कई बार उनके पास पहचान पत्र और मोबाइल फोन जैसे कोई सबूत नहीं होते, जिससे संबंधित व्यक्ति के परिजनों का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
इस दौरान जीआरपी ने लावारिस शवों के परिजनों तक पहुंचने के लिए शोध नाम से एक वेबसाइट भी शुरू की थी। जिस पर उन शवों की फोटो और उपलब्ध जानकारी अपलोड की जाती थी, जिनकी पहचान नहीं हो पाती थी। ताकि संबंधित व्यक्ति के परिजनों तक पहुंचने में मदद मिल सके। लेकिन समय के साथ यह प्रोजेक्ट बंद हो गया। इसके अलावा रेलवे स्टेशनों पर लावारिस शवों की जानकारी देने वाले मृतकों के फोटो वाले बैनर लगाए जा रहे थे। लेकिन यात्रियों द्वारा यह भावनाएं व्यक्त किए जाने के बाद कि ये फोटो विध्वंसक हैं, ऐसे बैनर भी बंद कर दिए गए।
रेल हादसों में शवों की पहचान करना जब मुश्किल होता है, तो ऐसे शवों को १५ दिन से लेकर एक महीने तक मुर्दाघरों में रखा जाता है। इनके फोटो महानगर क्षेत्र के सभी थानों में भेजे जाते हैं। ताकि अगर थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज हो तो उसके अनुसार जांच कर शव की पहचान की जा सके। लेकिन अगर उसके बाद कोई नहीं आता है, तो प्रशासन खुद ही शव का अंतिम संस्कार कर देता है,” एक पुलिस अधिकारी ने कहा।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में शव के कपड़े, सामान और फोटो रिकॉर्ड में रखे जाते हैं। ताकि भविष्य में अगर रिश्तेदार मिलते हैं या मृतक की पहचान होती है, तो जानकारी मिल सके।


