तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के लड्डू प्रसाद में मिलावटी घी मामले में वकीलों ने रखा मजबूत पक्ष।

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शिव पूजन पांडेय/मुंबई वार्ता

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 26 जून को पमिल जैन और विपिन जैन द्वारा दायर जमानत याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। दोनों आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं और उनके विरुद्ध प्राथमिकी संख्या 470/2024, दिनांक 25 सितंबर 2024 को दर्ज की गई थी। यह मामला तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) को कथित रूप से मिलावटी गौघी की आपूर्ति से संबंधित है, जिसमें एम/एस एआर डेयरी का नाम सामने आया है।

प्राथमिकी टीटीडी के महाप्रबंधक द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि एम/एस एआर डेयरी ने निविदा की शर्तों का उल्लंघन करते हुए पूजा-पाठ में उपयोग हेतु मिलावटी घी की आपूर्ति की, जिससे न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य बल्कि धार्मिक आस्था पर भी आघात पहुंचा।मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) के गठन का निर्देश दिया, जिसने फरवरी 2025 में आरोपियों को तलब कर न्यायिक हिरासत में भेजा।

प्रसारण एजेंसियों के अनुसार, आरोप है कि मिलावटी घी की आपूर्ति भोले बाबा डेयरी से शुरू होकर एम/एस वैष्णवी डेयरी के माध्यम से टीटीडी तक पहुंची। वर्तमान में मामले की जांच सीबीआई के नेतृत्व में विभिन्न एजेंसियों द्वारा की जा रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. श्रीराम एवं अधिवक्ता सुशील कुमार ने आरोपियों की ओर से जोरदार बहस करते हुए अदालत के समक्ष यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं की लंबे समय से चल रही हिरासत और जांच प्रक्रिया में गंभीर प्रक्रियागत खामियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें जमानत दी जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि SIT और CBI ने मार्च और अप्रैल 2025 में गवाहों को डराने का आरोप लगाया, जबकि संबंधित एफआईआर जून 2025 में दर्ज की गई, जो जांच एजेंसियों की देरी और अनियमितता को दर्शाता है।सीबीआई की ओर से स्थायी वकील पीएसपी सुरेश कुमार ने कहा कि सभी शिकायतें मजिस्ट्रेट की अनुमति से दर्ज की गईं और जांच में कोई कोताही नहीं बरती गई है।वहीं, बचाव पक्ष ने यह भी इंगित किया कि उच्च न्यायालय की एक समवर्ती पीठ पहले ही एक ऐसे अधिकारी के आचरण पर आपत्ति जता चुकी है, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित SIT का हिस्सा नहीं था, फिर भी उसने जांच में हस्तक्षेप किया। वरिष्ठ अधिवक्ता एस. श्रीराम और अधिवक्ता सुशील कुमार ने यह आश्वासन दिया कि याचिकाकर्ता न्यायालय द्वारा लगाई जाने वाली किसी भी कड़ी शर्त का पालन करने को तैयार हैं, चाहे वह आवाजाही पर रोक हो, नियमित रिपोर्टिंग हो या गवाहों से दूरी बनाए रखना हो।

उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता न तो फरार होने की मंशा रखते हैं और न ही जांच में किसी प्रकार का सहयोग देने से पीछे हटे हैं।सुनवाई के पश्चात, माननीय न्यायमूर्ति श्रीनिवास रेड्डी ने आदेश सुरक्षित रख लिया है। यह मामला न केवल धार्मिक और संस्थागत महत्व रखता है, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।टीटीडी जैसे देश के अत्यंत श्रद्धेय धार्मिक संस्थान से जुड़े इस मामले पर देशभर में जन और मीडिया की गहन रुचि बनी हुई है। उच्च न्यायालय का आगामी निर्णय सार्वजनिक खरीद और धार्मिक संस्थानों में आपराधिक जवाबदेही से संबंधित मामलों में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

अधिवक्ता सुशील कुमार कुमार लीगल रिसर्च एलएलपी के प्रबंध साझेदार, देश के प्रमुख आपराधिक और कॉरपोरेट मामलों के वकीलों में गिने जाते हैं। वे उच्चतम न्यायालय, विभिन्न उच्च न्यायालयों, एनसीएलटी, एनसीएलएटी, प्रतिस्पर्धा आयोग सहित विभिन्न न्यायिक मंचों पर अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे टीवी चैनलों के प्रमुख डिबेट्स और इंटरव्यू में भी सक्रिय रूप से नजर आते हैं।

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