डाॅ धीरज फूलमती सिंह/ स्तंभकार/ मुंबई वार्ता

जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन बरंजिश
बेहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है’
यह 80 के दशक के मशहूर एक गीत के बोल है, जिसे आज का युवा भी गुनगुनाता है पर गाने की शुरुआती दो पंक्तियां 90 फीसदी लोगों को समझ नहीं आतीं है।
इसका अर्थ कुछ ऐसा है- “मेरे दिल का ख्याल करो, इससे नाराजगी न जताओ,इस बेचारे दिल ने हाल में जुदाई का दर्द सहा है!”
प्रसिद्ध सुफी फनकार “अमीर खुसरों” की रचना से प्रेरित होकर वास्तव में गुलजार साहब ने इस सुन्दर गीत को जन-जन तक पहुचाया था,जो साहित्य प्रेमियों के लिए एक शानदार चमकीला बेशकीमती खजाना है।


18 अगस्त 1934 को इस धरती पर एक सितारे ने जन्म तो “संपूर्ण सिंह कालरा” के नाम से लिया था पर पूरी दुनिया में रौशनी बिखेरी “गुलजार” के नाम से!
आज 90 साल की उम्र पार कर चुके गुलज़ार एक मशहूर शायर हैं जो फ़िल्में बनाते हैं। गुलज़ार एक अप्रतिम फ़िल्मकार हैं जो कविताएँ लिखते हैं,एक कहानीकार है,जो अपनी कल्पनाओ की दुनिया की सैर कराते है। मौशिकी के एक फनकार है,जो दिलों में बस जाते है। सच कहूं तो साहित्य के पुरौधा गुलजार की यात्रा बिमल राय के सहायक निर्देशक के रूप में शुरू हुए थी। पढ़ने लिखने के शौक ने उन्हें एक मोटर गैराज़ पर काम करते वक़्त भी नहीं छोड़ा, जहां वो रंग रोगन की ख़ातिर आई हुई गाड़ियों पर रंग से रंग मिलाने का काम किया करते थे।


बकौल गुलजार उन्हें वहाँ एक बड़ा वक्त पढ़ने लिखने के लिए मिल जाया करता था। फ़िल्मों में काम करने को लेकर उनके ख़याल थोड़ा अलग किस्म के थे,वो शायद ये मानते थे कि फ़िल्मों में बहुत पढ़े लिखे लोग नहीं जाते ? वो तो एक बार फ़िल्मकार बिमल रॉय की फ़िल्म में गीत लिखने को जब उनसे कहा गया तो थोड़ा हिचकिचा गए थे,तब महान गीतकार शैलेन्द्र ने उनसे कहा “जाते क्यों नहीं, फ़िल्मों में सब ग़ैर पढ़े लिखे ही काम करते हैं क्या”? इस स्नेहिल घुडकी के बाद ही वो गीत लिखने को तैयार हुए,जिसे आज हम सब जानते हैं।
बंदिनी फ़िल्म का ‘मोरा गोरा रंग लइ ले, जैसे ख़ूबसूरत गीत को उन्होंने कागज़ पर उतारा। ये गुलज़ार साहब की हिंदी सिनेमा में पहली दस्तक थी और उसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा,फ़िल्मी दुनिया के वो तमाम गीत जिन्हें गुलज़ार साहब की क़लम ने अंजाम दिए, आज भी संगीत के आसमान पर सितारों की तरह जगमगा रहे हैं,रौशनी बिखेर रहे है।
संबंधों की बात करें तो ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी और गुलज़ार के रिश्ते भावनाओं से भरे हुए रहे हैं। मीना ने मौत से पहले अपनी तमाम डायरी और शायरी की कापियाँ गुलज़ार को सौंप दी थीं। गुलज़ार ने उन्हें संपादित कर बाद में प्रकाशित भी कराया था। आज भी गुलज़ार के ऑफिस में दीवार पर ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी का चित्र बोलता सा नजर आता है।
मीना कुमारी की मौत 1972 में हुई थी। इस के बाद साल 1973 में गुलज़ार का संजोग कुछ ऐसा बना कि उन्होंने फ़िल्म अभिनेत्री राखी से शादी कर ली। राखी और गुलज़ार की शादी में गुलज़ार ने सिर्फ एक शर्त रखी कि राखी शादी के बाद फ़िल्मों में काम नहीं करेंगी। राखी ने गुलज़ार का कहा माना और काम बन्द कर दिया। इसके बावजूद इन दोनों की कभी नहीं बनी और तीन साल बाद राखी अपनी बेटी मेघना को लेकर गुलज़ार से अलग हो गईं और उन्होंने फिर से फ़िल्मों में काम करना शुरू कर दिया।
रिश्तो में मायूसी मिलने के बाद भी फ़िल्मों की दुनिया में उनकी कविताई इस तरह चली कि हर कोई गुनगुना उठा। एक ‘गुलज़ार-टाइप’ बन गया। अनूठे संवाद, अविस्मरणीय पटकथाएँ, आसपास की ज़िन्दगी के लम्हे उठाती मुग्धकारी फ़िल्में। ‘परिचय’, ‘आँधी’, ‘मौसम’, ‘किनारा’, ‘ख़ुशबू’, ‘नमकीन’, ‘अंगूर’, ‘इजाज़त’—हर एक अपने में अलग। साल 1934 में झेलम जिले के दीना गाँव (अब पाकिस्तान) में जन्मे गुलज़ार ने रिश्ते और राजनीति दोनों की बराबर परख की। उन्होंने ‘माचिस’ और ‘हू-तू-तू’ बनाई, ‘सत्या’ के लिए लिखा—’गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है…।‘
आज 90 साल की उम्र में भी सफ़र इसी तरह जारी है। फ़िल्में भी हैं और ‘पाजी नज़्मों’ का खजाना भी आकार ले रहा है। गुलज़ार साहेब हमारे अपने ज़माने की उर्दू शायरी की बड़ी भारी शख्सियत तो हैं ही पर उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनके जैसा शायर उर्दू में पहले कभी नहीं हुआ। गुलजार साहब वर्तमान से जुड़े हुए हैं। समय की नब्ज़ को पकड़े हुए हैं। वह इस बात का रोना नहीं रोते कि पुराना जमाना अच्छा था,नया जमाना बुरा है,वो नये जमाने को भी सकारात्मक चुनौती के तौर पर लेते है और उसी के साथ कदमताल भी करते है,यही वजह है कि वह हर बार नए नजर आते हैं।
गुलज़ार साहेब की यह खुशकिस्मती है कि उनकी शोहरत उन फ़िल्मी सितारों जैसी है जो सीधे सिनेमा के परदे पर देखे जाते है, जब कि गुलज़ार साहेब तो हरदम परदे की ओट में छिपे रहे, गीतकार ही नहीं बल्कि फिल्म-निदेशक के तौर पर भी! गुलज़ार साहेब की छवि इतनी व्यापक है कि उनका कवि उसमें कही छिप-सा जाता है,जैसे उसको सिनेमा का ग्रहण लग गया हो।


