मुंबई वार्ता/संजय जोशी

अहमदाबाद के केके. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान 2024 से प्रख्यात संस्कृत विद्वान महामहोपाध्याय स्वामी भद्रेशदासजी को उनके महान ग्रंथ ‘स्वामिनारायण सिद्धान्त सुधा’ के लिए सम्मानित किया गया है। विगत दिनों 27 मार्च 2025 को इस पुरस्कार की घोषणा की गई थी, जिसे अहमदाबाद में आयोजित एक भव्य समारोह में औपचारिक रुप से प्रदान किया गया। गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने यह पुरस्कार प्रदान किया।


अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि संस्कृत भारत की सभ्यता और संस्कृति की एक गहरी अभिव्यक्ति है, जिसकी जड़ें मानवता और प्रकृति के कल्याण में समाई हुई है। उन्होंने सभी से संस्कृत शास्त्रों के सार को समझने और इस भाषा की सुंदरता की सराहना करने का आग्रह किया।
इसके अलावा, राज्यपाल ने स्वामी भद्रेशदासजी के स्मारकीय योगदान की सराहना करते हुए उनके कार्य को दार्शनिक और अकादमिक उत्कृष्टता का एक प्रकाश स्तंभ बताया, जो आत्माओं को जोड़ता है और विश्व स्तर पर भारत की बौद्धिक उपस्थिति को ऊपर उठाता है। राज्यपाल ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के युग में युवा पीढ़ी को प्रेरित करने में, विशेष रुप से भारतीय संस्कृति, विरासत, कला और दर्शन को बढ़ावा देने के लिए बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था के प्रयासों की भी सराहना की।


फाउंडेशन के निदेशक और सदस्य सचिव डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण ने प्रशस्ति पत्र, एक पट्टिका और देवी सरस्वती की एक प्रतिमा के साथ 15 लाख रुपये का नकद पुरस्कार भेंट किया। स्वामी भद्रेशदासजी ने सहर्ष यह पुरस्कार राशि बीएपीएस के धर्मार्थ (चैरिटेबल) गतिविधियों के लिए समर्पित कर दी।सरस्वती सम्मान की चयन समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अर्जन कुमार सिकरी ने पुरस्कार विजेता को बधाई दी और एक भाषा के रुप में संस्कृत के अद्वितीय आकर्षण पर प्रकाश डाला, जिसे उन्होंने वैज्ञानिक, विशाल और कालातीत (टाइमलेस) बताया।
उन्होंने टिप्पणी की कि स्वामी भद्रेशदासजी जैसे विद्वानों के कारण संस्कृत को दुनिया भर में नई पहचान और सम्मान मिल रहा है। 1991 में स्थापित, सरस्वती सम्मान भारत के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों में से एक है, जो प्रतिवर्ष केके. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 23 भाषाओं में से किसी भी भाषा के उत्कृष्ट साहित्यिक कार्यों के लिए प्रदान किया जाता है। ज्ञान की देवी, सरस्वती के नाम पर यह पुरस्कार भारतीय साहित्य में असाधारण योगदान का सम्मान करता है।
समारोह में बीएपीएस के स्वामी आनंदस्वरूपदासजी, स्वामी ब्रह्मविहारिदासजी, और श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक उपस्थित रहे। इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी भारत भर के संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रतिष्ठित विद्वान, और लगभग दस हजार उपस्थित लोग बने, जिन्होंने स्वामी भद्रेशदासजी को मिले इस सम्मान का उत्सव मनाया।


