समीर वानखेडे मामले में केंद्र पर लगा 20 हज़ार का जुर्माना।

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श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े से जुड़ी केंद्र सरकार की एक याचिका खारिज कर दी। अदालत ने केंद्र सरकार पर 20000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। केंद्र ने अपनी याचिका में कोर्ट से अपने पहले के आदेश की समीक्षा करने की मांग की थी।

आदेश में कहा गया था कि यदि आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े योग्य पाए जाते हैं तो उन्हें सीमा शुल्क और अप्रत्यक्ष कर के संयुक्त आयुक्त (जेसी) के पद पर पदोन्नत किया जाए। केंद्र के वकील आशीष दीक्षित ने न्यायाधीश नवीन चावला और न्यायाधीश मधु जैन की पीठ से 28 अगस्त के आदेश को रद्द करने का आग्रह किया था।

अपने आदेश में अदालत ने कैट के उस फैसले को बरकरार रखा था जिसमें केंद्र को वानखेड़े की पदोन्नति से संबंधित सीलबंद लिफाफा खोलने और यदि यूपीएससी द्वारा उनके नाम की सिफारिश की जाती है तो उन्हें जनवरी 2021 से पदोन्नति प्रदान करने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला था कि आज की तारीख तक, केंद्र सरकार पदोन्नति को सीलबंद लिफाफे में रखने का कोई मामला बनाने में विफल रही है। क्योंकि न तो कोई आरोप पत्र था, न ही कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित थी और न ही कोई आपराधिक मामला था।

केंद्र के वकील ने तर्क दिया कि 28 अगस्त के आदेश से पहले सक्षम प्राधिकारी ने 18 अगस्त को वानखेड़े के खिलाफ आरोप ज्ञापन जारी किया था और नियमित विभागीय कार्यवाही शुरू की थी। उन्होंने आगे तर्क दिया कि अदालत का फैसला इस गलत तथ्यात्मक धारणा पर आधारित था कि कोई आरोप-पत्र या आरोप-पत्र जारी नहीं किया गया था। इसलिए इस त्रुटि के आधार पर पुनर्विचार उचित था।हालांकि, वानखेड़े के वकील टी सिंहदेव ने कोर्ट से याचिका खारिज करने का आग्रह करते हुए कहा कि यह उनके मुवक्किल को परेशान करने की एक चाल है। सिंहदेव ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पदोन्नति आदेश जनवरी 2021 में जारी किया गया था। केंद्र ने इसके कार्यान्वयन में देरी की और उनके मुवक्किल द्वारा अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने के बाद ही कैट के निर्देश को चुनौती दी।

उन्होंने आगे कहा कि उच्च न्यायालय 29 जुलाई को कैट के आदेश के खिलाफ केंद्र की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। लेकिन, केंद्र ने 18 अगस्त को उनके मुवक्किल के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर दिया। हालांकि 28 अगस्त को फैसला सुनाए जाने से पहले अदालत को इस घटनाक्रम की जानकारी देने में विफल रहा। सिंहदेव ने यह भी बताया कि अपनी समीक्षा याचिका में केंद्र ने इस तथ्य को छिपाया कि कैट ने 27 अगस्त के अपने आदेश के माध्यम से वानखेड़े के खिलाफ विभागीय जांच को आगे बढ़ाने से रोक दिया था।

दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी और तथ्यों को छिपाने के लिए केंद्र की कड़ी आलोचना की। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हमने पक्षों के वकीलों द्वारा पेश किए गए दलीलों पर विचार किया है। 29 सितंबर को जब हमने रिट पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था, तब भी इन पर विचार नहीं किया गया था।अदालत ने कहा कि हम याचिकाकर्ता द्वारा इस न्यायालय से 27 अगस्त 2025 के उस आदेश को छिपाने की कड़ी निंदा करते हैं जिसमें याचिकाकर्ता को प्रतिवादी के विरुद्ध आगे की विभागीय जांच करने से रोक दिया गया था। हम उम्मीद करते हैं कि याचिकाकर्ता रिट दायर करते समय हमारे समक्ष सभी तथ्यों का सच्चाई से खुलासा करेगा। हम 20000 की राशि दिल्ली उच्च न्यायालय अधिवक्ता कल्याण कोष में जमा करने के आदेश के साथ इस याचिका को खारिज करते हैं।

ज्ञात हो कि समीर वानखेड़े 2021 में तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने मुंबई नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के जोनल डायरेक्टर के पद पर रहते हुए अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार किया था। हालांकि, बाद में आर्यन खान को मामले में न फंसाने के बदले शाहरुख खान से कथित तौर पर 25 करोड़ की रिश्वत मांगने के आरोप में वे सीबीआई और ईडी सहित कई एजेंसियों की जांच के घेरे में आ गए।

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