मुंबई वार्ता/विनोद पाठक/ स्तंभकार

क्या आज की राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है?क्या वह जनसेवा का माध्यम न रहकर स्वार्थ, सत्ता और शोषण का औज़ार बनती जा रही है? ये प्रश्न केवल विचार नहीं, बल्कि आम जनमानस की पीड़ा की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।एक समय था जब नेता शब्द सुनते ही श्रद्धा का भाव जाग उठता था। नेता का अर्थ था—समाज का मार्गदर्शक, संकट में ढाल, और अन्याय के विरुद्ध निर्भीक आवाज़। आज स्थिति उलट प्रतीत होती है। नेता की परिभाषा बदल गई है—अब वह अक्सर सत्ता-समीकरण, निजी लाभ और अवसरवाद से जुड़कर देखी जाती है।


● सेवा बनाम सत्ता
पहले राजनीति सेवा का संकल्प थी; आज वह कई जगह सत्ता का सौदा बन गई है। जनप्रतिनिधि जनता के बीच रहते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे, और समाधान तक साथ चलते थे। आज फ़ाइलों, मंचों और कैमरों के बीच आम आदमी की आवाज़ दबती दिखती है। चुनाव के समय वादे, जीत के बाद बहाने—यह चक्र जनता के भरोसे को तोड़ता है।
● नेता की असली कसौटी
नेता वही नहीं जो भाषण दे, पोस्टर लगाए या नारों से भीड़ जुटाए।नेता वही है जो सुख-दुख में काम आए।जो बाढ़ में पहुँचे, महामारी में साथ खड़ा हो, अन्याय पर आवाज़ उठाए—चाहे कीमत चुकानी पड़े। जो सत्ता के गलियारों से ज़्यादा गलियों में दिखे; जो आँकड़ों से नहीं, आँसुओं से जुड़ा हो।
● राजनीति का नैतिक संकट
आज राजनीति एक नैतिक संकट से गुजर रही है। धनबल, बाहुबल और जाति-धर्म की गणनाएँ जनहित को पीछे धकेल रही हैं। सोशल मीडिया की चमक ने काम की ज़मीन को ढक दिया है। परिणामस्वरूप जनता राजनीति से दूर, और राजनीति जनता से बेगानी होती जा रही है।
●समाधान: दिशा-परिवर्तन का समय
राजनीति को सही दिशा देने के लिए तीन ठोस कदम आवश्यक हैं—चरित्र की राजनीति: ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही को अनिवार्य मानक बनाया जाए।जन-संवाद: नियमित जनसुनवाई, ज़मीनी फीडबैक और समयबद्ध समाधान।
● युवा और मूल्य:
राजनीति में युवाओं की भागीदारी केवल उम्र से नहीं, मूल्यों से हो—सेवा, संवेदना और साहस के साथ।जनता की भूमिकाकेवल नेताओं को कोसना पर्याप्त नहीं। जनता को भी सजग होना होगा—जाति या लालच नहीं, योग्यता और नीयत देखकर वोट देना होगा।सवाल पूछने होंगे, जवाब माँगने होंगे, और पाँच साल तक जागरूक रहना होगा।
● निष्कर्ष
राजनीति न तो गंदी है, न ही शोषण का पर्याय—उसे गंदा बनाया गया है। अब समय है उसे शुद्ध करने का, संवेदनशील बनाने का, और सेवा के पथ पर लौटाने का।क्योंकि याद रखिए—सुख-दुख में जो काम आए, वही असली नेता है।



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