राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण का कहर जारी ।

Date:

●बच्चों व गर्भवतियों की मौतें,कोर्ट ने सरकार को घेरा

मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के मेलघाट और धरनी सहित अन्य आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण से बच्चों और गर्भवती महिलाओं की लगातार हो रही मौतों को लेकर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए जवाब तलब किया है।

न्यायालय ने कहा कि कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं में कमियों को दूर करने संबंधी पूर्व में दिए निर्देशों व कई समितियों की रिपोर्टों के बावजूद, राज्य सरकार प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने में विफल रही है।

मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की खंडपीठ इस मामले से संबंधित कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में आदिवासी बच्चों में गंभीर कुपोषण, गर्भवती महिलाओं की प्रसव के दौरान बढ़ती मौतों और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता जुगलकिशोर गिल्डा ने न्यायालय को बताया कि पिछले कुछ वर्षों में कुपोषण से लगभग 30,000 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने कहा कि सड़क संपर्क की कमी, स्वच्छ पेयजल का अभाव, अनुभवी चिकित्सकों की कमी और मेडिकल रोस्टर में लगातार बदलाव जैसी व्यवस्थागत खामियाँ इन मौतों के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।एक अन्य याचिकाकर्ता राजेन्द्र बर्मा ने न्यायालय को सूचित किया कि 15 नवंबर 2025 को अमरावती जिले के मेलघाट क्षेत्र में छह माह से छह वर्ष तक की आयु के चार बच्चों की कुपोषण के कारण 24 घंटे के भीतर मृत्यु हो गई। उसी दिन चिकित्सकीय लापरवाही से एक युवा गर्भवती महिला की भी मृत्यु हुई।

बर्मा ने स्वास्थ्य विभाग पर “बेकार बहाने” बनाने का आरोप लगाते हुए इसे प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बताया।इस पर राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने न्यायालय को बताया कि मेलघाट में 105 चिकित्सक तैनात किए गए हैं तथा एनीमिया, बाल-विवाह और कम आयु में गर्भधारण जैसी सामाजिक स्थितियाँ भी इन मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार हैं।

इस पर न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासनिक विफलताओं को आधार बनाकर राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। न्यायालय ने ऐसे क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मज़बूत करने की आवश्यकता भी रेखांकित की।न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि पिछले वर्षों में इस मुद्दे पर दिए गए न्यायालयीन आदेशों और उनके पालन में उठाए गए कदमों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाए। इसके साथ ही चार सप्ताह के भीतर भविष्य के लिए स्पष्ट “कार्यान्वयन रोडमैप” भी मांगा गया है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आचार संहिता को इस प्रक्रिया में बाधा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। याचिकाकर्ताओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को सुझाव देने की अनुमति भी प्रदान की गई है।इन निर्देशों के बाद मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

प्रमुख खबरे

More like this
Related

राम मंदिर इलाके में सार्वजनिक शौचालय में संदिग्ध रासायनिक रिसाव, दम घुटने से दो युवकों की मौत।

मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय राम मंदिर (पूर्व) के मृणालताई...