मुंबई वार्ता संवाददाता

गोरेगांव के गोकुलधाम स्थित प्रसूति गृह की इमारत को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत नवजात शिशु कक्ष (एनआईसीयू) सहित माता एवं बाल अस्पताल शुरू करने के लिए दिया गया था, लेकिन आरोप है कि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करते हुए वहां अस्पताल के बजाय स्कूल संचालित किया जा रहा है। इस मामले को लेकर स्थानीय नगरसेविका प्रीति सातम ने महानगरपालिका सदन में आपत्ति का मुद्दा उठाते हुए संबंधित संस्था मेसर्स लाइफ लाइन का अनुबंध तत्काल समाप्त करने और वहां बीएमसी की ओर से माता एवं शिशु अस्पताल शुरू करने की मांग की।


महापौर रितू तावडे ने मामले को गंभीर बताते हुए महानगरपालिका प्रशासन को मेसर्स लाइफ लाइन संस्था की जांच कर कड़ी कार्रवाई करने तथा कार्रवाई की रिपोर्ट उन्हें प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
प्रीति साटम ने सदन में बताया कि गोकुलधाम प्रसूति गृह की इमारत प्रसूति अस्पताल के लिए आरक्षित थी। वर्ष 2018 में सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बाद इस तीन मंजिला इमारत को 15 वर्ष के लीज अनुबंध पर मेसर्स लाइफ लाइन संस्था को नवजात शिशु कक्ष सहित माता एवं बाल अस्पताल शुरू करने के लिए सौंपा गया था। अनुबंध के अनुसार चार महीने के भीतर स्वास्थ्य सेवाएं शुरू करना अनिवार्य था, लेकिन संस्था ऐसा करने में विफल रही।
उन्होंने आरोप लगाया कि अस्पताल शुरू न होने के कारण गोरेगांव के एक नवजात शिशु को समय पर एनआईसीयू सुविधा नहीं मिल सकी और उसे भांडुप के अस्पताल में स्थानांतरित करना पड़ा, जहां उपचार में देरी के चलते उसकी मौत हो गई। सातम का कहना है कि यदि गोकुलधाम में वादा की गई सुविधा शुरू हो गई होती तो उस बच्चे की जान बचाई जा सकती थी।
नगरसेविका ने यह भी आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग ने वर्षों तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की और संबंधित संस्था को संरक्षण दिया।
उन्होंने सदन में फोटो और दस्तावेज पेश करते हुए दावा किया कि अस्पताल की जगह वर्तमान में स्कूल संचालित किया जा रहा है, जो अनुबंध का स्पष्ट उल्लंघन है।
साटम ने मांग की कि मेसर्स लाइफ लाइन संस्था का अनुबंध तत्काल रद्द किया जाए, गोकुलधाम, आरे कॉलोनी, संतोष नगर और आसपास के गरीब परिवारों के लिए वहां आधुनिक माता एवं बाल अस्पताल तथा एनआईसीयू शुरू किया जाए। साथ ही भूतल पर ‘हिंदू हृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे आपला दवाखाना’ भी शुरू करने की मांग की।
महापौर रितू तावडे ने कहा कि वर्ष 2018 से इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष हो रहा है। इसलिए संस्था की विस्तृत जांच कर दोषी पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाए और पूरे मामले की प्रगति रिपोर्ट नियमित रूप से सदन के समक्ष प्रस्तुत की जाए।


