भीमा-कोरेगांव आरोपियों की प्रेस क्लब बैठक मामले में पत्रकार गुरबीर सिंह को राहत नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने की अंतरिम याचिका खारिज

Date:

मुंबई वार्ता संवाददाता

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई प्रेस क्लब से छह वर्ष के लिए निष्कासित किए गए पत्रकार गुरबीर सिंह को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति प्रफुल्ल एस. खुबालकर ने उनकी अंतरिम आवेदन याचिका खारिज करते हुए कहा कि प्रेस क्लब की प्रबंध समिति का निर्णय न तो मनमाना है और न ही ऐसा है जिसमें न्यायालय को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता हो।


मामला 19 जनवरी 2026 का है, जब गुरबीर सिंह और दो अन्य सदस्यों ने मुंबई प्रेस क्लब परिसर में एक बैठक आयोजित की थी, जिसमें 2018 के भीमा-कोरेगांव मामले के चार आरोपियों को आमंत्रित किया गया था। आरोप है कि इस बैठक के जरिए आरोपियों को एक साथ आने की सुविधा दी गई, जिससे उनकी जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने की आशंका पैदा हुई।
घटना के बाद मुंबई प्रेस क्लब ने 22 फरवरी 2026 को गुरबीर सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। उनके जवाब पर विचार करने के बाद प्रबंध समिति ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने 25 अप्रैल 2026 को अपनी रिपोर्ट में गुरबीर सिंह को बैठक आयोजित कराने का जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद प्रबंध समिति ने 27 अप्रैल 2026 से प्रभावी छह वर्षों के लिए गुरबीर सिंह और दो अन्य सदस्यों को क्लब से निष्कासित करने का निर्णय लिया।


गुरबीर सिंह ने इस निर्णय को सिविल अदालत में चुनौती देते हुए निष्कासन पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने 1 जुलाई 2026 को उनकी अंतरिम अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।


याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निष्कासन क्लब के उपनियमों के अनुच्छेद 11(डी) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, क्योंकि जांच से संबंधित मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि गुरबीर सिंह जांच प्रक्रिया में शामिल हुए थे और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था।


अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इस बैठक के आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने संबंधित आरोपियों की जमानत रद्द करने के लिए भी आवेदन दायर किया था।


सुप्रीम कोर्ट के टी.पी. डावर बनाम लॉज विक्टोरिया मामले के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि क्लबों के आंतरिक मामलों में सिविल अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होता है और केवल तभी किया जा सकता है जब संस्था ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर, दुर्भावना से या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए निर्णय लिया हो।


न्यायमूर्ति खुबालकर ने अपने आदेश में कहा कि “प्रबंध समिति का निर्णय किसी भी दृष्टि से विकृत (Perverse) नहीं है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।” हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी केवल अंतरिम आवेदन के निपटारे तक सीमित है और मुख्य वाद की सुनवाई पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

प्रमुख खबरे

More like this
Related

मालाड में विसर्जन जुलूस से पहले ही पुलिस की कार्रवाई, डीजे और साउंड सिस्टम जब्त।

मुंबई वार्ता संवाददाता मुंबई के मालाड इलाके में गणेश...

जोगेश्वरी में बंद कृत्रिम विसर्जन तालाब में उतरा युवक, करंट लगने से 19 वर्षीय मजदूर की मौत।

मुंबई वार्ता संवाददाता जोगेश्वरी पूर्व के श्यामनगर तालाब...