सुरेश मिश्र/हास्य कवि /मुंबई वार्ता

हम हंसिया-लेहना जानी ला,पुर,मोट,नार पहिचानी ला ।
हर, हेंगा, जुवा, थून्हि,धुरई,पउदरि,नाधा,खुरपी, गुड़ुई ।
सांवां,काकुनि,कोदो, भांटा,मकरा,पनुवा,चेनगा, लाटा ।
चील्होरि, सुटुर्र या ठठा-मठा,गोना उ पदउवल खूब जटा।
हम खूब करोवनि खाए ह,खुझड़ी बिन गदर मचाए ह।
बहुरी, व फुटेहरा चबा-चबा, गोंइठा व गुरम्मा भूलि गवा ।
दंवरी, बखरी,डेबरी, देहरी, गुल्ली-डंडा, चरखी,कथरी।
खांची-खांचा, पीढ़ा, चकरी,कॉंड़ी,गउखा, पॅंहसुलि, घुघुरी।
चूरन,पपड़ी, पनुवां, पाटी,सिल्हि, लोढ़ा, कुढ़ा, चियां, गांती।
तख्ती,दुद्धी, नरकट, बोरिका,बींड़ा, गड़ेर,मचिया, मांचा।
सब लेइं घमउनी जाड़ा मा,बरधा बान्हइं जब बाड़ा मा।
चकबेनियां खूब नचाइ गवा,पैरा पालइ के दिवस गवा।
खोन्था,लग्गी-लग्गा, तप्ता,कटवांसी खतम उंटहरा का।
अब कहां हरैली याद अहइ,केउ कूदत ना डंड़वारी बा।
दस मउजा मा तू ढूंढ़ि लेव एक्कउ घर नाहिं बरारी बा।
ना सेन्हि फुटइ, ना गोरुआरी,ना चुवइ ओरौनी ओरी से।
पंडोह शब्द सब भूलि गएन,ना चलइ परौता गोरी से।
झेंलगां, कउड़ा,मुठिया, दबिला,ना मिलइ कतहुं से अब पहार।
ना दिखइ मियाना गउवां में,ना तउ डोली मा बा ओहार।
दिन कटत रहल अमराई मा,पंड़िया,बछिया अउ गाई मा।
गोरू, बछरू डेंड़यात रहेन,केउ बेंचइ नाहिं कसाई मा।
दिन कटत रहल अमराई मा,पंड़िया,बछिया अउ गाई मा।
गोरू, बछरू डेंड़यात रहेन,केउ बेंचइ नाहिं कसाई मा।
सावन भर बितइ पटोहा मा,पटुली दइ-दइ कजरी गावइं।
फागुन भर भउजी देवर क,गोबरी से हर दिन नहवावइंजब से बम्बइया आइ गए,माटी कइ महक भुलाइ गए।
मनई दिन कइसेउ काटत बा,खाली वाटसप के चाटत बा ।
एनकर गलती, ओनके गारी,सब लिखत अहेन बारी-बारी।
यहिं से अच्छा ऊ गांव रहल,अमवां-निमियां के छांव रहल।
माई-बाबू के पांव चली,हे भइया आवा गांव चली।




