■ 11 अस्पतालों की सफाई का दो साल का ठेका एक ही कंपनी को मिला; 10 ठेकेदारों की बोलियां खारिज होने के बाद शेष रही केवल एक कंपनी, अतिरिक्त आयुक्त ने जांच का दिया आश्वासन।
मुंबई वार्ता संवाददाता

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के 11 उपनगरीय अस्पतालों में साफ-सफाई और हाउसकीपिंग सेवाओं के लिए दिए गए 13.60 करोड़ रुपये के ठेके को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस दो वर्षीय ठेके में मुंबई के पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों के बीच सफाई की दरों में 21.5 प्रतिशत का अंतर सामने आया है। पिछले महीने आवंटित इस ठेके में कुल 11 कंपनियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन इनमें से 10 कंपनियों की बोलियां खारिज कर दी गईं। इसके बाद श्री कृपा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (Shree Krupa Services Pvt Ltd) दोनों क्षेत्रों का ठेका हासिल करने वाली एकमात्र सफल कंपनी बनकर सामने आई।


ठेके के अनुसार, पूर्वी मुंबई के अस्पतालों में सफाई के लिए कंपनी को 9.799 रुपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह और पश्चिमी मुंबई के अस्पतालों के लिए 8.065 रुपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह का भुगतान किया जाएगा। दोनों दरों के बीच 1.734 रुपये प्रति वर्ग फुट का अंतर है। इसी अंतर को लेकर ठेके की लागत तय करने के आधार और निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।


अधिवक्ता राजेश चव्हाण ने बीएमसी के स्वास्थ्य विभाग के समक्ष यह मामला उठाते हुए पूछा है कि जब 11 में से 10 कंपनियों की बोलियां खारिज कर दी गईं, तो केवल एक पात्र बोलीदाता के आधार पर ठेका कैसे आवंटित किया गया? उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि क्या निविदा प्रक्रिया में न्यूनतम तीन पात्र बोलीदाताओं की अनिवार्य शर्त पूरी की गई थी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो बीएमसी ने दोबारा निविदा आमंत्रित करने के बजाय किस नियम या प्रावधान के तहत ठेका आवंटित किया? क्या इसके लिए किसी विशेष अनुमति या सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी ली गई थी?
जानकारी के अनुसार, नौ कंपनियों को वित्तीय मूल्यांकन के दौरान उनकी ओर से बताई गई दरों को अव्यावहारिक मानते हुए अयोग्य घोषित कर दिया गया। वहीं, बॉस सिक्योरिटी एंड सर्विसेज नामक कंपनी को तकनीकी आधार पर अयोग्य ठहराया गया। इस तरह श्री कृपा सर्विसेज ही दोनों क्षेत्रों के ठेके हासिल करने वाली एकमात्र सफल बोलीदाता रह गई।चव्हाण ने यह भी सवाल उठाया है कि श्री कृपा सर्विसेज को दोनों क्षेत्रों के लिए पात्र कैसे माना गया। उन्होंने कंपनी की वित्तीय स्थिति, कर्मचारियों की उपलब्धता, तकनीकी योग्यता और एक साथ 11 अस्पतालों में सेवाएं संचालित करने की क्षमता के मूल्यांकन से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है।
उनका कहना है कि दोनों क्षेत्रों के लिए कंपनी की पात्रता का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया गया था या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए।पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र के अस्पतालों में दरों का अंतरदरअसल, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों के अस्पतालों में सफाई की दरों में अंतर इस पूरे मामले का प्रमुख मुद्दा बन गया है। चव्हाण ने बीएमसी से पूछा है कि इन दरों को तय करने के लिए किस तरह की लागत गणना की गई। क्या अस्पतालों के क्षेत्रफल, काम के बोझ, कर्मचारियों की संख्या, उनकी तैनाती और सफाई सेवाओं के दायरे को ध्यान में रखकर अलग-अलग दरें निर्धारित की गई हैं?
उन्होंने इन दरों के समर्थन में इस्तेमाल किए गए दस्तावेज और गणना का विवरण भी मांगा है।पूर्वी क्षेत्र के ठेके में कुर्ला भाभा अस्पताल, मां अस्पताल, गोवंडी स्थित शताब्दी अस्पताल, घाटकोपर का राजावाड़ी अस्पताल और मुलुंड का वीर सावरकर अस्पताल शामिल हैं।वहीं, पश्चिमी क्षेत्र के ठेके में बांद्रा भाभा अस्पताल, सांताक्रूज का वी.एन. देसाई अस्पताल, मालाड के एम.डब्ल्यू. देसाई अस्पताल और एस.के. पाटिल अस्पताल, कांदिवली का शताब्दी अस्पताल तथा बोरीवली का सावित्रीबाई फुले अस्पताल शामिल हैं।
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए बीएमसी के उपायुक्त शरद उघाड़े ने कहा कि निविदा प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सभी सवालों की जांच की जाएगी। यदि जांच में किसी तरह की अनियमितता सामने आती है, तो महानगरपालिका उचित कार्रवाई करेगी। जरूरत पड़ने पर इस काम के लिए दोबारा निविदा भी आमंत्रित की जा सकती है।
गौरतलब है कि यह ठेका 11 सार्वजनिक अस्पतालों की साफ-सफाई जैसी आवश्यक सेवा से जुड़ा है, जहां प्रतिदिन हजारों मरीज और उनके परिजन आते हैं। ऐसे में बीएमसी को यह स्पष्ट करना होगा कि 10 कंपनियों को किन आधारों पर अयोग्य घोषित किया गया, एकमात्र सफल कंपनी ने दोनों क्षेत्रों की पात्रता संबंधी शर्तें कैसे पूरी कीं और पूर्वी तथा पश्चिमी मुंबई के बीच सफाई की दरों में इतना अंतर क्यों रखा गया।
हालांकि, केवल दरों में अंतर होना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन एक ही कंपनी को दोनों क्षेत्रों का ठेका मिलना, प्रतिस्पर्धी कंपनियों की बोलियां खारिज होना और दरों में 21.5 प्रतिशत का अंतर होने से निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। अब बीएमसी की जांच से स्पष्ट होगा कि ठेके की दरें तय करने और कंपनी का चयन करने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप थी या इसमें सुधार की आवश्यकता है।


