■ मुंबई की आर्थर रोड जेल में 999 की क्षमता के मुकाबले 3,534 कैदी, राज्य की जेलों में चिकित्सा सुविधाओं और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी का मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा।
मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र की जेलों में कैदियों की संख्या निर्धारित क्षमता से करीब 40 प्रतिशत अधिक हो गई है। राज्य की 60 जेलों में कुल 38,515 कैदी बंद हैं, जबकि इन जेलों की स्वीकृत क्षमता केवल 27,503 कैदियों की है। इसके साथ ही जेलों में चिकित्सा सुविधाओं और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भी भारी कमी सामने आई है।


राज्य सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया है कि चिकित्सा अधिकारियों के 100 स्वीकृत पदों में से 52 पद खाली हैं। वहीं, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के कुल 21 स्वीकृत पदों में से 19 पद रिक्त हैं। पूरे जेल विभाग में केवल एक पूर्णकालिक मनोवैज्ञानिक और एक मनोचिकित्सक कार्यरत हैं।जेल एवं सुधारात्मक सेवाओं के महानिदेशक सुहास वारके की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में ये जानकारियां दी गई हैं।
हलफनामे के मुताबिक, 30 अप्रैल 2026 तक महाराष्ट्र की जेलों में 38,515 कैदी बंद थे, जबकि उनकी निर्धारित क्षमता 27,503 है। इस तरह जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता के लगभग 140 प्रतिशत तक पहुंच गई है।यह हलफनामा जेलों में अमानवीय परिस्थितियों से संबंधित स्वत: संज्ञान जनहित याचिका के सिलसिले में दाखिल किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई शुरू की थी।82.61 प्रतिशत कैदी विचाराधीनसरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि महाराष्ट्र की जेलों में बंद कुल कैदियों में 82.61 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं। इनमें 31,821 कैदी ऐसे हैं, जिनके मुकदमों का फैसला होना बाकी है। इसके मुकाबले दोषी करार दिए जा चुके कैदियों की संख्या 6,248 है।राज्य की नौ केंद्रीय जेलों में स्थिति और भी गंभीर है। इन जेलों की निर्धारित क्षमता 16,075 कैदियों की है, लेकिन यहां 25,473 कैदी बंद हैं। यानी इन जेलों में क्षमता से करीब 60 प्रतिशत अधिक कैदी रखे गए हैं।
मुंबई की आर्थर रोड सेंट्रल जेल में सबसे गंभीर स्थिति सामने आई है। यहां केवल 999 कैदियों को रखने की क्षमता है, जबकि 3,534 कैदी बंद हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में 2,777 की क्षमता के मुकाबले 5,991 कैदी हैं। इसी तरह ठाणे सेंट्रल जेल में 1,141 कैदियों की क्षमता के मुकाबले 2,726 कैदी रखे गए हैं।इसके विपरीत, राज्य की 19 खुली जेलों में निर्धारित क्षमता का लगभग 52 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है। इन जेलों में 3,307 कैदियों को रखने की क्षमता है, जबकि वर्तमान में यहां 1,732 कैदी बंद हैं।
■ मनोवैज्ञानिकों के 19 पद खाली, एनजीओ के भरोसे काउंसलिंग
जेलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी को लेकर भी सरकार ने अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट की। मनोवैज्ञानिकों के 12 स्वीकृत पदों में से 11 और मनोचिकित्सकों के नौ पदों में से आठ रिक्त हैं। इस तरह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कुल 21 पदों में से केवल दो पदों पर नियुक्तियां हैं।विशेषज्ञों की कमी के कारण कैदियों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी काउंसलिंग, नशामुक्ति और अन्य सेवाओं के लिए गैर-सरकारी संगठनों और ट्रस्टों की मदद ली जा रही है। इनमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की फील्ड एक्शन परियोजना प्रयास और मानव फाउंडेशन शामिल हैं।
सरकार ने बताया कि मानव फाउंडेशन और प्रोजेक्ट मुंबई सीएचएस लिमिटेड के माध्यम से पिछले तीन वर्षों में 12,515 कैदियों को नशे की लत से संबंधित मनोवैज्ञानिक परामर्श दिया गया है।खुली जेलों में सुधार के लिए समिति गठितराज्य सरकार ने हाईकोर्ट को यह भी जानकारी दी कि खुली जेलों में सुधार के लिए न्यायमूर्ति भारती डांगरे की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की गई है। यह समिति विभिन्न जेलों का दौरा कर रही है और पात्र कैदियों को खुली जेलों में स्थानांतरित करने से संबंधित नीतियों की समीक्षा कर रही है।
12 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत मांगी गई विस्तृत जानकारी के साथ व्यापक जवाब दाखिल करने की सराहना की थी।मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली पीठ ने जेलों की स्थिति सुधारने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर सरकार से ताजा जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को निर्धारित की गई है।लंबे समय तक जेल में रहने से मानसिक स्वास्थ्य पर असरबॉम्बे हाईकोर्ट पहले भी जेलों में अत्यधिक भीड़ और लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जता चुका है।
पिछले वर्ष हत्या के एक मामले में नौ साल तक जेल में बंद रहे विचाराधीन आरोपी को जमानत देते समय हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लंबे समय तक जेल में रहने से नशीले पदार्थों के सेवन जैसी अस्वस्थ आदतें विकसित हो सकती हैं। अदालत ने यह भी कहा था कि जेल से बाहर आने के बाद कैदियों को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है, जिससे परिवार और दोस्तों के साथ उनके रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं।हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने भी जेलों में चौबीसों घंटे चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया था। अदालत ने कहा था कि जेलों में अत्यधिक भीड़ और कर्मचारियों की कमी से जेल प्रशासन प्रभावित होता है और कैदियों को इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में ले जाना पड़ता है।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि जेलों में समय पर चिकित्सा उपचार के साथ 24 घंटे चिकित्सक, मनोचिकित्सक और अन्य चिकित्सा कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। अदालत के अनुसार, फिलहाल जेलों में ऐसी व्यवस्था की कमी दिखाई दे रही है।महाराष्ट्र की जेलों से सामने आए ये आंकड़े कैदियों की बढ़ती संख्या, विचाराधीन मामलों के लंबित रहने और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी गंभीर प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर करते हैं।


