■ उस दौर में जब भारतीय महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना दुर्लभ था, इरावती कर्वे ने नृविज्ञान (Anthropology) की पढ़ाई के लिए जर्मनी की यात्रा की।
प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित (कुलगुरू /जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय /दिल्ली ) स्तंभकार/मुंबई वार्ता

भारत में महिला सशक्तिकरण की अवधारणा काफी हद तक पश्चिम से उधार लिए गए वैचारिक ढांचों तक सीमित रही है। ये ढांचे प्रभावशाली तो हैं, लेकिन वे उस सभ्यतागत भावना को पकड़ने में विफल रहते हैं जिसके माध्यम से भारतीय समाज ने ऐतिहासिक रूप से ‘स्त्रीत्व’ को समझा है।


भारतीय परंपरा में ‘शक्ति’ का विचार ऊर्जा, ज्ञान और उस रचनात्मक बल का प्रतीक है जो समाज को संजोए रखता है। इस दृष्टिकोण को पुनर्जीवित करने के लिए न केवल दार्शनिक चिंतन की आवश्यकता है, बल्कि उन महिलाओं की खोज और पहचान भी जरूरी है जिन्होंने लिंग संबंधी समकालीन बहसों के उभरने से बहुत पहले भारत के बौद्धिक परिदृश्य को आकार दिया था। ऐसी ही विभूतियों में इरावती कर्वे का नाम भारत की सबसे प्रखर समाजशास्त्रियों और नृविज्ञानियों में शुमार है, जिनका कार्य हमारी शैक्षणिक और सार्वजनिक चेतना में कहीं अधिक सम्मान का पात्र है।


जब हम अग्रणी महिलाओं की बात करते हैं, तो चर्चा अक्सर प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) की ओर मुड़ जाती है। वैश्विक स्तर पर मैरी क्यूरी महिला वैज्ञानिक उपलब्धि का प्रतीक बनी हुई हैं। भारत में भी हम कमला सोहोनी या जानकी अम्माल जैसे पथ-प्रदर्शकों को याद करते हैं जिन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के द्वार खोले। हालांकि, सामाजिक विज्ञान में महिलाओं की उपस्थिति पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। भारतीय समाज में सामाजिक विज्ञान की अक्सर उपेक्षा की गई है, जो कि विडंबनापूर्ण है, क्योंकि ये विषय समाज, संस्कृति और सभ्यता की व्याख्या के लिए मौलिक हैं।


यह असंतुलन न केवल हमारी संस्कृति को समझने के प्रयासों को कमजोर करता है, बल्कि बाहरी लोगों को उनके मनमाने अर्थ निकालने का अवसर भी देता है। इसी कारण इरावती कर्वे जैसे विचारकों का योगदान ओझल हो गया, जिन्होंने भारतीय समाजशास्त्र और नृविज्ञान की नींव रखने में मदद की थी।कर्वे विद्वानों की उस पीढ़ी से थीं जो भारत के बौद्धिक मंथन के दौर में उभरीं। 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में भारतीय सामाजिक विज्ञान का उदय हुआ, जब विद्वानों ने अपने समाज को केवल औपनिवेशिक चश्मे से नहीं, बल्कि गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अन्वेषण के माध्यम से समझने की कोशिश की।


इसी माहौल में कर्वे ने पद्धतिगत कठोरता और सभ्यतागत संवेदनशीलता के अनूठे मेल के साथ भारतीय समाज का अध्ययन शुरू किया।उस समय जब भारतीय महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना असामान्य था, कर्वे नृविज्ञान पढ़ने जर्मनी गईं। वहां उन्होंने यूरोपीय नृवंशविज्ञान परंपराओं को सीखा, लेकिन उनकी असली प्रतिभा तब सामने आई जब उन्होंने तत्कालीन ‘फिजिकल एंथ्रोपोलॉजी’ की सीमाओं को लांघा। पश्चिमी ढांचे की नकल करने के बजाय, उन्होंने भारत में व्यापक नृवंशविज्ञान (Ethnographic) फील्डवर्क और मौखिक इतिहास संकलन की शुरुआत की।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की विद्वत्ता के साथ स्वदेशी वास्तविकताओं को जोड़ने की उनकी यह क्षमता उनकी विरासत की सबसे विशिष्ट विशेषता है।भारत लौटने के बाद, कर्वे ने समाजशास्त्र और नृविज्ञान को गंभीर शैक्षणिक विषयों के रूप में स्थापित करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने जाति, नातेदारी (Kinship) और क्षेत्रीय संस्कृतियों की जटिलताओं का पता लगाया। उनके शोध ने सिद्ध किया कि भारतीय समाज को कठोर श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता, बल्कि यह भूगोल, भाषा और ऐतिहासिक अंतःक्रियाओं द्वारा आकार ली हुई एक विविधतापूर्ण व्यवस्था है। भारत भर में नातेदारी संरचनाओं पर उनका प्रभावशाली अध्ययन आज भी एक मील का पत्थर है।
अक्सर कर्वे को केवल डेटा और विधियों तक सीमित एक ‘तकनीकी समाजशास्त्री’ मान लिया जाता है। लेकिन वह भारत की बौद्धिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी विचारक थीं। महाभारत के पात्रों पर उनके विचार, जो उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘युगांत’ में व्यक्त हुए हैं, दर्शाते हैं कि कैसे उन्होंने समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि को साहित्यिक और दार्शनिक चिंतन के साथ जोड़ा। उन्होंने इस महाकाव्य को केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानवीय जीवन के नैतिक दुविधाओं और राजनीतिक तनावों के दर्पण के रूप में देखा। उनका कार्य ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ (IKS) की उस वास्तविक भावना के अनुरूप है, जहां ज्ञान का निर्माण संस्कृति और समाज की एकीकृत समझ से होता है।
इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, मुख्यधारा की बौद्धिक चर्चाओं में कर्वे का नाम पर्याप्त रूप से नहीं आता। यह उपेक्षा उस व्यापक कमी को दर्शाती है जहां महिलाओं के बौद्धिक श्रम को कम करके आंका जाता है। इरावती कर्वे जैसी शख्सियतों को याद करना केवल एक ऐतिहासिक सुधार नहीं है, बल्कि ‘भारतीय बौद्धिक नारीवाद’ की परंपरा को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है। कर्वे का जीवन दिखाता है कि महिलाएं अपनी सभ्यतागत संदर्भों के भीतर ज्ञान सृजन में गहरा योगदान दे सकती हैं। यहीं पर ‘शक्ति’ का विचार सार्थक हो जाता है।
भारतीय कल्पना में शक्ति केवल बल नहीं, बल्कि ज्ञान और रचनात्मक क्षमता भी है। आज जब भारत अपनी ज्ञान परंपराओं को पुनर्जीवित करने और शैक्षणिक जीवन में महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने की बात कर रहा है, तो इरावती कर्वे जैसे विचारकों को याद करना अनिवार्य है। उन्हें अपनी सामूहिक स्मृति में वापस लाना व्यक्तिगत उपलब्धि का उत्सव मनाने के साथ-साथ ‘नारी शक्ति’ की भावना की पुष्टि करना है।


