■ मराठी अस्मिता के जोरदार अभियान के बावजूद बीएमसी में प्रवासी प्रतिनिधित्व बरकरार।
श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों में इस बार मराठी अस्मिता और “भूमिपुत्र” राजनीति को लेकर तीखा प्रचार देखने को मिला। कई राजनीतिक दलों ने चुनावी मैदान में मराठी पहचान को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन नतीजों में इसका असर सीमित ही दिखाई दिया। मुंबई की नगर निगम में गैर-मराठी (प्रवासी) पार्षदों की संख्या एक बार फिर एक-तिहाई से अधिक बनी हुई है।2026 के बीएमसी चुनावों में गैर-मराठी पार्षदों की संख्या बढ़कर 78 हो गई है, जबकि 2017 के चुनावों में यह संख्या 76 थी।


मराठी अस्मिता के आक्रामक प्रचार के बावजूद प्रवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व न सिर्फ कायम रहा, बल्कि इसमें मामूली बढ़ोतरी भी दर्ज की गई।चुनावी अभियान और हकीकतचुनाव प्रचार के दौरान कई मंचों से यह संदेश दिया गया कि मुंबई की सत्ता में मराठी समाज की हिस्सेदारी बढ़ाई जानी चाहिए। रैलियों, भाषणों और घोषणापत्रों में मराठी भाषा, संस्कृति और स्थानीय युवाओं के अधिकारों को प्रमुखता से उठाया गया। इसके बावजूद मतदाताओं ने बड़ी संख्या में उन उम्मीदवारों को भी समर्थन दिया, जिनकी पहचान गैर-मराठी समुदाय से जुड़ी है।
मुंबई की बहुसांस्कृतिक तस्वीरविशेषज्ञों का मानना है कि यह परिणाम मुंबई की बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी पहचान को दर्शाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग दशकों से मुंबई की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा रहे हैं।
नगर निगम चुनावों में भी मतदाताओं ने जाति या भाषा से अधिक स्थानीय मुद्दों—जैसे पानी, सड़क, सफाई, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं—को प्राथमिकता दी।राजनीतिक दलों के लिए संकेतबीएमसी में गैर-मराठी पार्षदों की स्थिर मौजूदगी राजनीतिक दलों के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है कि केवल पहचान की राजनीति के सहारे मुंबई जैसे महानगर में निर्णायक बढ़त हासिल करना आसान नहीं है।
जमीनी काम, स्थानीय संपर्क और विकास के वादे अब भी चुनावी सफलता के प्रमुख आधार बने हुए हैं।कुल मिलाकर, 2026 के बीएमसी चुनावों ने एक बार फिर साबित किया है कि मराठी अस्मिता के मुद्दे के बावजूद मुंबई की नगर निगम में प्रवासी प्रतिनिधित्व मजबूत बना हुआ है और शहर की विविधतापूर्ण पहचान राजनीतिक संरचना में भी साफ झलकती है।


