संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर संघ की आपत्तियों को लेकर कांग्रेस का तीखा प्रहार।

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●यह कृतघ्नता नहीं , मानसिक हीनता है : गोपालदादा तिवारी

संजय जोशी/मुंबई वार्ता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले द्वारा संविधान में उल्लिखित ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों पर आपत्ति जताने पर कांग्रेस ने कड़ा प्रतिवाद किया है। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने इसे संविधानिक मूल्यों के प्रति मानसिक हीनता का प्रतीक बताया है।

गोपालदादा तिवारी ने कहा कि जो सत्ता में तीसरी बार देश के सभी धर्मों के नागरिकों के समर्थन से आए हैं, वे अब अगर “धर्मनिरपेक्षता” और “समाजवाद” जैसे शब्दों पर आपत्ति उठा रहे हैं, तो यह हिंदू समाज के अलावा बौद्ध, जैन, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बोहरा आदि समुदायों के प्रति घोर अपमान और संविधान से पलायन की प्रवृत्ति दर्शाता है।

उन्होंने कहा, जो लोग देश के विभिन्न धर्मों को स्वीकार नहीं करते, उनसे न्याय नहीं कर सकते, उनके प्रति आदर नहीं रखते, वे विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं, यह हास्यास्पद है।

कांग्रेस प्रवक्ता ने संघ की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि 1942 से 1947 के बीच चले ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में आरएसएस का कोई योगदान नहीं रहा, जबकि भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, पं. नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसी संघर्ष की नींव पर 26 जनवरी 1950 को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा रचित संविधान लागू हुआ।उन्होंने कहा कि अब तक सत्ता में रही किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने ‘समाजवाद’ या ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्दों को हटाने की मांग नहीं की। लेकिन 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झूठा मुखौटा पहनकर सत्ता में आई थी, आज संवैधानिक कर्तव्यों के साथ धोखा कर रही है।

गोपालदादा तिवारी ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष की तरफ से बार-बार एक ही धर्म के वर्चस्व की बात करना, समाज में तनाव फैलाना, यह न केवल राजनीतिक गैर-जिम्मेदारी है, बल्कि संविधान विरोधी आचरण भी है।उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ‘समाजवाद’ शब्द का संविधान में समावेश इसलिए किया गया था ताकि देश की संपत्ति पूंजीवादी ताकतों के हाथ में न जाए। इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल भी तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय दबावों और आंतरिक अस्थिरता की स्थितियों के मद्देनज़र लिया गया निर्णय था।

तिवारी ने सवाल उठाया कि जब स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत ‘धर्मनिरपेक्ष समाजवाद युक्त संविधान’ की प्रशंसा कर चुके हैं, तब फिर संघ के कार्यवाह द्वारा उसके विपरीत बयानबाजी क्यों? उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आज संघ और भाजपा की ओर से इस प्रकार के बयान इसलिए दिलवाए जा रहे हैं ताकि बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों और उद्यमियों की समस्याओं, आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाया जा सके। यह सरकार की विफलताओं को छिपाने का प्रयास है।

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