मुंबई वार्ता संवाददाता

महाराष्ट्र की राजनीति में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों से पहले बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। राज्य के मंत्री नितेश राणे के एक बयान ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा है कि यदि आगामी चुनावों में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा) के उम्मीदवार जीतते हैं, तो वे संबंधित क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए फंड जारी नहीं करेंगे।राणे के इस बयान के सामने आते ही विपक्षी दलों ने कड़ा ऐतराज जताया है।


विपक्ष का कहना है कि विकास निधि जनता की होती है, न कि किसी मंत्री या पार्टी की निजी संपत्ति। चुनाव परिणामों के आधार पर फंड रोकने की चेतावनी देना लोकतंत्र और संविधान की भावना के खिलाफ है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मंत्री सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं और जनता के अधिकारों पर कुठाराघात कर रहे हैं।
राज्य में 7 फरवरी को 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों के लिए मतदान होना है, जबकि 9 फरवरी को मतगणना की जाएगी। ऐसे समय में इस तरह का बयान चुनावी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की बयानबाजी से न केवल राजनीतिक तापमान बढ़ता है, बल्कि प्रशासन की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
विपक्ष ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि आचार संहिता के तहत ऐसे बयान पर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, सत्ताधारी पक्ष के कुछ नेताओं ने इस बयान को व्यक्तिगत राय बताते हुए दूरी बनाने की कोशिश की है।


