ऑपरेशन सिंदूर: कहां था रूस?

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ज्ञानेंद्र मिश्र/मुंबई वार्ता/ स्तंभकार

स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा अवसर आया होगा कि जब भारत किसी भी प्रकार के संकट के मुहाने पर खड़ा हो और असमंजस और अंधेरे के उसे दोराहे पर रौशनी का दीप जलाए रूस खड़ा न दिखाई दे।रूस और भारत के ऐतिहासिक संबंधों को परिभाषित करने के लिए 1955 में भारत आए रूसी राष्ट्रपति निखिता किश्चोव के मात्र इस बयान को देखा जाना चाहिए जो की काफी होगा- *यदि भारत पर्वत के शिखर पर से भी हमें आवाज लगाएगा तो हम उसके आसपास दिखाई देंगे

● रूस का ऐतिहासिक समर्थन

संयुक्त राष्ट्र में भारत विरोधी प्रस्ताव को पास करने के प्रयास के दौरान रूस ने कम से कम छह बार अपने निषेधाधिकार (वीटो पावर) का इस्तेमाल कर भारत के विरुद्ध प्रस्ताव पास होने से रोका है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ उठाए गए कम से कम 6 प्रस्तावों को अपने वीटो के बल पर रोक दिया था। 1957, 1962 और 1971 में कश्मीर के मुद्दे के अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूस ने अपने निषेधाधिकार का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को पास होने से रोक दिया। गोवा में पुर्तगाल शासन हटाने के लिए भारत द्वारा सैन्य कार्रवाई को भी रूस ने भारत के विरुद्ध पास होने वाले प्रस्ताव को अपने वीटो से रोक दिया था। वहीं 2019 में भी जब धारा 370 कश्मीर से हटाई गई तो उस वक्त भी रूस ने भारत का खुला समर्थन किया।सोवियत संघ की टूट के पहले और बिखरने के बाद भी, रूस के जितने भी राष्ट्राध्यक्ष भारत यात्रा पर आए या भारतीय राष्ट्राध्यक्ष रूस गए या किसी भी अंतरराष्ट्रीय पटल पर मिले हैं तो एक दूसरे के प्रति सम्मान और शत-प्रतिशत सहयोग को प्रदर्शित करने में कत्तई भी पीछे नहीं रहे हैं, कोई कोताही नहीं बरती।

● रूस का बदलता रवैया

फिर ऐसा क्या हुआ की *”पहलगाम हिंदू नरसंहार” और “ऑपरेशन सिंदूर”* के दौरान रूस का रवैया- पूरी तरह से तटस्थ-हैरान कर देने वाला रहा?? *ऑपरेशन सिंदूर* के दौरान जहां चीन ने तुर्की के साथ मिलकर पाकिस्तान के लिए खुला समर्थन जाहिर किया वहीं रूस और भारत को एक छत के नीचे हर मौसम के मित्र के दृष्टिकोण से देखने वालों के लिए हैरान-जनक स्थिति पैदा हुई जब रूस ने एक तटस्थ भूमिका अपनाते हुए एक औपचारिक बयान जारी किया कि भारत और रूस को आपस में मिल बैठकर इस समस्या का समाधान निकालना चाहिए, यहां तक की रूस ने अपनी मध्यस्थता की बात भी कही।

● रूस के बदले हुएरवैये के कारण

इसके कई कारण हो सकते हैं;

१) दुनिया में राजनयिक (कूटनीतिक) संबंधों के समीकरण बहुत तेजी से बदले हैं बाद- रूस और यूक्रेन के युद्ध के दौरान चीन ने ताइवान के मद्देनजर रूस का समर्थन किया है जिससे चीन और रूस के संबंधों के समीकरण “तटस्थ” से “सकारात्मक” दिशा में सुदृढ़ हुए हैं।

२) वहीं रूस और यूक्रेन के युद्ध के दौरान भारत ने तटस्थ भूमिका निभाई और भारत के बयान रूस-भारत के संबंधों की गर्मजोशी को नजरअंदाज करते हुए औपचारिक बयान- यह युद्ध का समय नहीं है, आपस में मिल बैठ कर बात करके समस्या का समाधान निकालना चाहिए- ने रूस को निराश किया।

३) सतही स्तर पर ही सही मगर भारत और अमेरिका के संबंधों में गहराई देखने को मिलती है उनके बीच व्यापार की संभावनाएं तो बड़ी ही हैं हथियारों के आयात में भी भारत ने अमेरिका से अपने व्यापारिक संबंध सुदृढ़ किए हैं।

४) राजनयिक कदम (कूटनीतिक रणनीति) के दृष्टिकोण से भारत ने अमेरिका से हथियारों का आयात बढ़ाया वहीं रूस से हथियारों के आयात में पिछले कुछ वर्षों में कमी देखी जा रही है जिसका मुख्य कारण रूस की अपनी आवश्यकताएं यूक्रेन युद्ध के कारण बढ़ी हैं और व्यापार भी संकुचित हुआ है।

५) भारत ने वैश्विक मंच पर खुले तौर पर रूस के साथ खड़ा हुआ दिखाई देना- इस स्वरूप से बचने की कोशिश की है- जिसने रूस और भारत के संबंध को असहज बनाया है।

६) उसके ऊपर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युद्ध के दौरान ही यूक्रेन की यात्रा की और साथ ही यह बयान भी दिया कि किसी भी देश की संप्रभुता पर हमला नहीं होना चाहिए जिसे निश्चित तौर पर रूस को दुखी किया होगा। रूस तथा यूक्रेन के युद्ध के दौरान यूक्रेन की यात्रा करना निश्चित तौर पर एक गलत कदम या असफल प्रयास (मिस एडवेंचर) कहा जा सकता है- यह भी कहा जा सकता है कि पांव पर कुल्हाड़ी मारने के समान या आत्मघाती कदम था।

७) हालांकि भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद भी रूस के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखें और रूस के साथ ईंधन के आयात में- हालांकि यह भारत के‌ ही हित में था- किसी प्रकार की कमी नहीं की मगर चीन ने रूस को यूक्रेन युद्ध में खुला समर्थन दिया और दक्षिण कोरिया को भी रूस के सहयोगी के दृष्टिकोण से तैयार किया, साथ ही दोनों के आपसी व्यापार में वृद्धि भी देखी गई।

८) उपर्युक्त कारणों से रूस किसी भी प्रकार से अपने नए साथी चीन को असहज नहीं करना चाहता। और फिर भारत को खुला समर्थन देने के बाद रूस को चीन और भारत के बीच संबंधों के समीकरण को संतुलित करने के लिए विशेष प्रयास करने होते जिसके लिए यूक्रेन में उलझे युद्ध के कारण उसके पास ना तो समय है और ना ही ऊर्जा।

९) सामरिक (रणनीतिक) दृष्टिकोण से रूस अफगानिस्तान में पांव जमाना चाहता है जिसके लिए उसने तालिबान से प्रतिबंध भी हटा दिया है और अफगानिस्तान में पांव जमाने के लिए पाकिस्तानी एकमात्र रास्ता है उसके लिए आता हुआ खुलकर भारत के साथ दिखाई नहीं दे सकता।

● निष्कर्ष

इतने सारे कारण होने के बावजूद भी यदि ऐतिहासिक रूप से आप देखें तो भारत और रूस के संबंधों की गंभीरता समुद्र की गहराई से भी गहरे और संबंधों के आदर्श हिमालय की चोटी से भी ऊंचे नजर आएंगे- क्योंकि अमेरिकी विरोध के बावजूद भी भारत ने रूस से S400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदी थी जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को बढ़त प्रदान की और पाकिस्तान हमले के हर प्रयास को सफलतापूर्वक विफल किया।

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा की विकास के नए दौर में, विश्व के नित् नए बदलते समीकरणों की दौड़ में हमारे पुराने और विश्वसनीय- हर मौसम के दोस्त, मित्र, शुभचिंतक, मौसमी मित्रों की भीड़ में कहीं पीछे न छूट जाएं।

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