■ हर्षवर्धन सपकाल ने खुद बनाया खाना, आदिवासियों के साथ ही किया निवास, कपड़ों का वितरण और स्वास्थ्य शिविर का आयोजन।
■ आदिवासी भाइयों के साथ दिवाली मनाने की हर्षवर्धन सपकाल की 26 साल पुरानी परंपरा।
मुंबई वार्ता संवाददाता

दिवाली को सबसे बड़ा त्योहार कहा जाता है, जिसके आनंद की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन आज भी समाज के लाखों लोग इस उत्सव की खुशियों से वंचित हैं। जहाँ अधिकांश लोग दिवाली अपने परिवार और मित्रों के साथ मनाते हैं, वहीं महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के लिए दिवाली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानों के बीच संबंधों को और गहरा करने वाला उत्सव है।दिवाली के तीन दिन हर्षवर्धन सपकाल ने सातपुड़ा पर्वतरांग के भिंगारा, चालिस टपरी और गोमाल जैसे गांवों के लोगों के साथ मनाए।


हर साल आदिवासी भाइयों के साथ दिवाली मनाने की यह परंपरा वे पिछले 26 वर्षों से निभा रहे हैं।आदिवासियों के साथ दिवाली मनाने के अपने अनुभव के बारे में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा,“गोमाल इलाका मेरे लिए केवल एक भूभाग नहीं है; यहाँ के लोगों से मेरा गहरा और आत्मीय रिश्ता है। ये लोग मेरे केवल परिचित नहीं, बल्कि मेरे अपने, मेरा परिवार हैं। पिछले 26 वर्षों से मैं एक व्रत निभा रहा हूँ — अपनी क्षमता के अनुसार, अपने भीतर का प्रकाश लेकर उस अंधेरे तक पहुँचने का जहाँ रोशनी की ज़रूरत है।”
” दिवाली प्रकाश का पर्व है, और मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि अपने संपूर्ण सामर्थ्य से यह प्रकाश यहाँ लाऊँ, अंधेरे को उजाले में बदल दूँ। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, इस वर्ष लगातार 27वें वर्ष मैं इन आदिवासी बस्तियों और गांवों में दिवाली मना रहा हूँ।हमारी यह परंपरा केवल त्योहार मनाने तक सीमित नहीं है। मिठाइयों के वितरण के साथ-साथ सामूहिक भोजन, ग्रामसभा का आयोजन, चिकित्सकीय शिविर और वस्त्र वितरण भी इस उत्सव के अभिन्न अंग हैं। यह कोई औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने परिवार के साथ दिवाली मनाने जैसा है। ये लोग मेरा परिवार हैं, और हम सब मिलकर इस प्रकाश पर्व को मनाते हैं,” ऐसा कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा।


सातपुड़ा पर्वतरांग मध्य भारत की एक विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पर्वतमाला है। यहाँ कई पारंपरिक आदिवासी जनजातियाँ निवास करती हैं। इन समुदायों का प्रकृति से गहरा और आध्यात्मिक संबंध है। वे पर्वत, वन, झरने, खेती और प्रकृति को जीवंत देवता मानकर उनकी रक्षा और संवर्धन करते हैं।
प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल का भी इन आदिवासी भाइयों से गहरा रिश्ता बन गया है, जो हर दिवाली के साथ और मजबूत होता जा रहा है। इन गाँवों तक सड़क न होने के कारण पहुँचना बहुत कठिन था, लेकिन दिवाली के अवसर पर आदिवासी परिवारों के लिए नए कपड़े, आवश्यक वस्तुएँ और दवाइयाँ पहुँचाने के लिए बड़ा प्रयास किया गया। बारिश के कारण ट्रैक्टर फँस जाने जैसी कठिनाइयों के बावजूद, स्वयंसेवकों के अथक प्रयासों से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इन आदिवासी भाइयों के साथ उत्साहपूर्ण माहौल में दिवाली मनाई।


