देश के कर्तव्य के लिए परिवार को समय नहीं दे पाए उज्ज्वल निकम, फिल्म देखकर हुआ इसका एहसास।

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मुंबई वार्ता संवाददाता

वरिष्ठ विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम का मानना है कि उनकी जिंदगी पर आधारित फिल्म में निर्माताओं ने कहानी को अपनी मर्जी से जरूरत से ज्यादा नहीं बदला है। निकम ने शुरुआत से ही स्पष्ट कर दिया था कि फिल्म में किसी भी व्यक्ति का महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने फिल्म में वास्तविक नामों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया। इसी वजह से फिल्म में उनका अपना नाम, न्यायाधीश का नाम, आरोपियों के नाम और आतंकवादी अजमल कसाब के वकील का नाम भी वास्तविक रखा गया है।

1993 के मुंबई बम धमाकों के मुकदमे के सिलसिले में मुंबई आने के बाद से उज्ज्वल निकम की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा अदालतों और कानूनी कार्यवाही में बीता। 1993 के बम धमाकों के मामले की सुनवाई लंबे समय तक आर्थर रोड जेल में हुई। इसके बाद 26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब का मुकदमा भी उनके पेशेवर जीवन का अहम हिस्सा बना। इन दोनों मामलों की कानूनी कार्यवाही के चलते उनके जीवन के लगभग 13 साल आर्थर रोड जेल में चलने वाली सुनवाई और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों में बीते।

निकम की दिनचर्या बेहद व्यस्त रहती थी। वह सुबह करीब 10 बजे घर से निकलते और शाम 6 या 7 बजे तक लौटते थे। उस समय उनके बच्चे अनिकेत और शर्वरी छोटे थे तथा जलगांव में पढ़ाई कर रहे थे। काम की व्यस्तता के कारण वह अपनी पत्नी ज्योति और बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे।फिल्म देखकर परिवार के प्रति महसूस हुआ अपराधबोधनिकम के जीवन के इस निजी संघर्ष को भी फिल्म में जगह दी गई है।

फिल्म देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाने के दौरान वह अपने परिवार के प्रति कहीं न कहीं अपने दायित्व पूरे नहीं कर पाए। उन्हें इस बात का अपराधबोध हुआ कि न्याय और देश की सेवा में व्यस्त रहने के कारण वह पत्नी और बच्चों को वह समय नहीं दे सके, जिसके वे हकदार थे।उनके जीवन का यह अनुभव इस सच्चाई को सामने लाता है कि पेशेवर जिम्मेदारियों और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन हो सकता है। जीवन में कुछ हासिल करने के लिए कई बार कुछ खोना भी पड़ता है। हालांकि, निकम का संदेश है कि जो खो गया, उसके दुख में डूबे रहने के बजाय जीवन में जो कुछ मिला है, उसमें संतुष्टि तलाशनी चाहिए।

■ कसाब की अदालती रणनीति के बीच सुनाई थीं पंक्तियां

अजमल कसाब की सुनवाई के दौरान जब वह अदालत में नाटकीय व्यवहार कर रहा था, तब निकम ने कुछ पंक्तियां सुनाई थीं। इनमें कसाब को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि उसने बार-बार अपने रंग और नकाब बदले, लेकिन आखिरकार उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया गया।उन्होंने एक अन्य पंक्ति के माध्यम से पाप और पुण्य की प्रकृति को भी व्यक्त किया। उनका भाव था कि यदि सभी लोग नेक होते, तो पाप कौन करता? और जब लोग पाप करते हैं, तभी उज्ज्वल निकम जैसे लोगों की भूमिका सामने आती है।इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने अपने पेशे और न्याय व्यवस्था में अपनी भूमिका को रेखांकित किया।

■ कानून, न्याय और देश के प्रति जिम्मेदारी सर्वोपरि

निकम के जीवन का मूल संदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति को पूरी निष्ठा के साथ अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। उनके लिए कानून, न्याय और देश के प्रति जिम्मेदारी हमेशा सर्वोपरि रही है। हालांकि, इस जिम्मेदारी को निभाने की कीमत उन्हें अपने पारिवारिक जीवन में भी चुकानी पड़ी।उनके अनुभव से यह बात सामने आती है कि कर्तव्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि निरंतर किए गए काम से साबित होता है।

सफलता हासिल करना महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने किए गए कार्यों से संतुष्टि प्राप्त करना उससे भी अधिक मायने रखता है।उज्ज्वल निकम की जिंदगी कर्तव्य, त्याग, पारिवारिक जिम्मेदारियों और आत्ममंथन के बीच के इसी संघर्ष को सामने रखती है। उनके अनुसार, जीवन में अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना और जो हासिल हुआ है, उसके प्रति संतुष्ट रहना ही जीवन का वास्तविक सार है।

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