रवीन्द्र मिश्रा । मुंबई वार्ता

महाराष्ट्र के पहले बालयोगी संत सदानंद महराज जो 55 वर्ष पहले अपने मां बाप को लेकर तुंगारेश्वर पर्वत शिखर के परशुराम कुण्ड पर तपस्या करने आए थे। उसी के उपलक्ष्य में बाबा के भक्त यहां तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान कर बाबा का आगमन दिवस मनाते हैं।


बालयोगी सदानंद महाराज ट्रस्ट के सदस्य पुरुषोत्तम पाटिल से उपलब्ध जानकारी के अनुसार भायंदर पश्चिम स्थित राई गांव के एक गृहस्थ परिवार में में एक प्रतापी बालक का जन्म हुआ । पिता गणेशपुरी में तपस्या करने वाले संत नित्यानंद स्वामी के भक्त थे। जब वे अपने बेटे का नामकरण की इच्छा से नित्यानंद महाराज से मिले तो उन्होंने कहा कि यह बालक हमेशा आनंद में रहेगा ।तभी नित्यानंद स्वामी ने उस बालक का नाम सदानंद रखा। साथ ही उस गृहस्थ से नित्यानंद स्वामी ने यह भी कहा कि इस बालक में संन्यास योग है ।यह महा संन्यासी संत होगा ।


बचपन से ही मन में त्याग भावना रखने वाले इस बालक को तन ढंकना अच्छा नहीं लगता। मां बाप कपड़ा पहनाते वह निकाल कर फेंक देता। कुछ बड़ा हुआ तो मां बाप ने उसे स्कूल भेजा । वहां नंग धडंग रहने से शिक्षकों की डाट पड़ती। घर में मां बाप का डर विद्यालय में शिक्षक का डर । दोनों के डर वह स्कूल के लिए निकलता लेकिन स्कूल में न जा कर गांव के बाहर मंदिर में जाकर वहां राम राम जपता।जब बच्चे स्कूल से लौटते तो वह उनके साथ घर लौट आता। जब वह 11 वर्ष का हुआ तो वह अपनी सभी संपत्ति गांव के एक मंदिर को दान कर माता पिता को साथ लेकर तुंगारेश्वर पर्वत के परशुराम कुण्ड पर तपस्या करने आ गया । तभी से उस उपलक्ष्य में बालयोगी सदानंद महाराज के शिष्य वहां पर बाबा का आगमन दिवस मनाते हैं। तभी से यहां 3 दिवसीय आगमन दिवस मनाया जाता है जहां बाबा के भक्तों द्वारा यहां विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
21 अप्रैल से 23 अप्रैल तक चलने वाले इस कार्यक्रम में विष्णु यज्ञ, सत्यनारायण महापूजा, संतों द्वारा धार्मिक प्रबचन, संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी पाठ, संतो के जीवन पर आधारित नाट्य,दीप प्रज्वलन जैसे कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कार्यक्रम में शामिल होने वाले भक्तों के लिए प्रतिदिन यहां भहाभंडारे की व्यवस्था होती है। यहां बालयोगी संत सदानंद महाराज के आगमन दिवस पर भारी संख्या में भक्त उपस्थित हो कर उत्सव मनाते हैं।


