कवि/सुरेश मिश्र/मुंबई वार्ता

पूस का महीना लग गया है। ठंडी अपने शबाब पर है और बिरहन की व्यथा अपने चरम पर। प्रकृति में हो रहे बदलाव का नायिका पर क्या असर पड़ रहा है। एक दिन परदेसी साजन का फोन आया और उन्होंने हाल चाल पूछा तो नायिका के नैनों से झरने बहने लगे। उसने कहा –


पिया बिना जिया मुरझाइ लागल राजाजी
अंसुवा से तकिया भिगाइ लागल राजाजी
सखियन क दियना बुझाइ लागल राजाजी
सोचि-सोचि हिया गुदगुदाइ लागल राजाजी
चरखी में उखिया पेराइ लागल राजाजी
चनवां क चुनियां नोचाइ लागल राजाजी
घुरवा पे कोहड़ा फराइ लागल राजाजी
घड़ी-घड़ी काम उधिराइ लागल राजाजी
सखियन क खेतवा जोताइ लागल राजाजी
धनिया क चटनी बनाइ लागल राजाजी
घरवा में चिउरा कुटाइ लागल राजाजी
हियरा में कउड़ा बराइ लागल राजाजी
बगिया से अगिया लगावेला कोयलिया
देखि-देखि देवरा बोलेला रोज बोलिया
सब लरिकोरि भइन मोरी हमजोलिया
पिया परदेस हौं त कऽ बने खटोलिया?
रहिया म डोलिया देखाइ लागल राजा जी
हमरा भी जिया ललचाइ लागल राजाजी
तहरा क सहरा सुहाइ लागल राजाजी
हमरा क सब कुछ बुझाइ लागल राजाजी
पुरवाई फिनिसे सुरसुराइ लागल राजाजी
पिया-पिया पपिहा सुनाइ लागल राजाजी
ठंडिया में दांत कटकटाइ लागल राजाजी
सेजिया पे जियरा भुनाइ लागल राजाजी ।



सुंदर रचना