भरतकुमार सोलंकी/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

देश की बड़ी कंपनियों के इतिहास को गौर से देखिए। तीस-चालीस साल पहले वे भी आपके जैसे ही छोटे दुकानदार थे। वही संघर्ष, वही ग्राहकों के पीछे भागना, वही नक़दी की चिंता। फिर ऐसा क्या हुआ कि आज वही दुकानदार देश की टॉप 500 कंपनियों के मालिक, मैनेजिंग डायरेक्टर या चेयरमैन बन बैठे?राज़ किसी ताबीज़ या किस्मत में नहीं, बल्कि समझदारी में छिपा हैं — और इस समझदारी का सबसे अहम किरदार हैं—आपका अकाउंटेंट।


अकाउंटेंट को बहुत लोग बस टैक्स और बही-खाते तक सीमित समझते हैं। मगर सच यह हैं कि किसी भी बिज़नेस की रीढ़ की हड्डी वही हैं। पूँजी का सही इस्तेमाल, कैश फ़्लो की निगरानी, मुनाफ़े की सच्चाई और नुक़सान की चेतावनी — ये सब वही बताता हैं। यही वह शख़्स हैं जो बार-बार आपके सामने आईना रखता हैं कि आप अपने पैसों के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं।
आपने कभी अपने अकाउंटेंट के साथ यह चर्चा की हैं कि आपकी कैपिटल हर साल कितना रिटर्न दे रही हैं? सालाना टर्नओवर आपकी पूँजी के कितने गुना है? बिज़नेस का नक़दी प्रवाह कैसा हैं — लगातार मजबूत या हमेशा खिंचा-तना? हर साल कितनी डूबत हो रही है? आपकी अपनी हर महीने की सैलरी निकालने के बाद आपकी पूँजी कितनी कमाई छोड़ रही हैं? उधार के चक्र पूरे होने में कितने दिन लगते हैं? बिक्री की वृद्धि स्थिर हैं, तेज़ हैं या रुकी हुई हैं?यही तो वे सवाल हैं; जो दुकानदार और अकाउंटेंट की चर्चा को सामान्य हिसाब-किताब से निकालकर असली रणनीति में बदलते हैं। इन्हीं सवालों के जवाब और उन पर लिए गए फैसले एक छोटे बिज़नेस को बड़ी कंपनी में बदलने की बुनियाद रखते हैं।
हर बड़े बिज़नेसमैन का एक टॉप सीक्रेट होता हैं — वह यह नहीं कि उन्हें कोई जादुई आइडिया मिला, न ही यह कि उनके पास कोई बड़ा निवेशक अचानक उतर आया। उनका टॉप-सीक्रेट यह हैं कि उन्होंने अपने अकाउंटेंट को कर्मचारी नहीं, साझेदार की तरह समझा। उन्होंने हर बड़े कदम से पहले संख्याओं की जुबान सुनी, कैपिटल की नब्ज़ टटोली, और पैसे को बैठाकर नहीं, काम पर लगा दिया।
बिज़नेस में तरक्क़ी के तीन स्तंभ हैं — विज़न, मैनेजमेंट और नंबर। विज़न मालिक का, मैनेजमेंट टीम का और नंबर — यह नंबर ही हैं जो सच्चाई बताते हैं। और इन नंबरों को समझाने वाला सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं — आपका अकाउंटेंट।इसलिए अगर आप भी चाहते हैं कि आपका छोटा कारोबार कल देश की बड़ी कंपनियों में शामिल हो, तो शुरुआत अपने अकाउंटेंट के साथ बैठकर कीजिए। सवाल पूछिए, जवाब समझिए, रणनीति बनाईए। बिज़नेस की गाड़ी तेज़ तभी दौड़ेगी, जब स्टीयरिंग आपके हाथ में और डैशबोर्ड अकाउंटेंट की नज़र में होगा।


