■ सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद बीएमसी की आनन-फानन में तोड़क कार्रवाई,
■ रात 11 बजे नोटिस देकर अगले दिन ढहा दिए गए मकान; स्थानीय नेताओं के विरोध के बावजूद नहीं रुकी कार्रवाई।
मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

बोरिवली में बेस्ट बस डिपो के लिए आरक्षित भूखंड पर हुए अनधिकृत निर्माणों को हटाने के मामले में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद निर्धारित समय सीमा में कार्रवाई नहीं करने पर शीर्ष अदालत ने 3 नवंबर को मनपा प्रशासन के प्रति कड़ी नाराजगी जताई थी।


अदालत ने इस मामले में बीएमसी आयुक्त अश्विनी भिड़े को अवमानना का नोटिस जारी करने के साथ ही महानगरपालिका पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके अलावा आयुक्त और उनके निजी कर्मचारियों का वेतन रोकने का निर्देश भी दिया था।सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बीएमसी प्रशासन ने आनन-फानन में बोरिवली स्थित संबंधित भूखंड पर तोड़क कार्रवाई शुरू कर दी।


स्थानीय पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी का आरोप है कि स्थानीय निवासियों को रात करीब 11 बजे नोटिस दिया गया और अगले ही दिन उनके घरों को तोड़ दिया गया। इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। उनका आरोप है कि उन्हें अपनी बात रखने और कानूनी पक्ष प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर तक नहीं दिया गया।इस कार्रवाई का स्थानीय पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी और विधायक संजय उपाध्याय ने विरोध किया था। इसके बावजूद मनपा प्रशासन ने तोड़क कार्रवाई जारी रखी।
बताया जा रहा है कि 40 से अधिक समय से बने 27 लोगों के घरों को भी तोड़ दिया गया है। गोपाल शेट्टी का दावा है कि तोड़क कार्रवाई में वैध घर भी शामिल थे और प्रभावित परिवारों की शिकायतों तथा उनके पक्ष को उचित तरीके से नहीं सुना जा रहा है।अपने ही दल के नेताओं और सरकार के स्तर पर इस मामले में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं होने से नाराज पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी ने विरोध स्वरूप अपना मुंडन कराया है।
उनका कहना है कि राज्य में भाजपा की सत्ता होने के बावजूद 27 लोगों के वैध घर तोड़ दिए गए और प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए उनकी सुनवाई तक नहीं हो रही है। उन्होंने यह भी कहा है कि वे अब किसी भी पार्टी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।
गोपाल शेट्टी के इस कदम से बोरिवली में तोड़क कार्रवाई का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन का सवाल है, तो दूसरी तरफ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मकानों की वैधता और उन्हें सुनवाई का उचित अवसर दिए जाने को लेकर बीएमसी प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।


