मुंबई वार्ता संवाददाता

आगामी राज्य की महानगरपालिका चुनावों को लेकर महायुति के घटक दलों की भूमिका अलग–अलग दिखाई दे रही है। एक ओर भाजपा ने विधायकों और सांसदों के करीबी रिश्तेदारों को टिकट न देकर जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका देने का निर्णय लिया है। नगरपालिका चुनावों में परिवारवाद को लेकर हुई कड़ी आलोचना के बाद भाजपा ने महापालिका चुनावों में स्पष्ट रूप से यू-टर्न लिया है। दूसरी ओर महायुति की सहयोगी पार्टी एकनाथ शिंदे की शिवसेना पर मुंबई महानगरपालिका चुनाव में परिवारवाद को खुलकर बढ़ावा देने का आरोप लग रहा है।


शिवसेना ने सीधे तौर पर विधायकों और सांसदों के बेटे-बेटियों, पत्नी और अन्य नजदीकी रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाया है। इससे सामान्य कार्यकर्ताओं में भारी नाराज़गी देखी जा रही है। कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि “क्या हम सिर्फ प्रचार के लिए झंडे और सतरंजी उठाने के लिए हैं?” इसी कारण मुंबई का राजनीतिक माहौल काफी गरमा गया है।


■ 8 वार्डों में नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट
शिंदे गुट की शिवसेना ने मुंबई के करीब 8 वार्डों में विधायकों-खासदारों के परिवारजनों को उम्मीदवार बनाया है। इनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं—
● वार्ड 169: विधायक मंगेश कुडाळकर के बेटे जय कुडाळकर● वार्ड 191: पूर्व विधायक सदा सरवणकर की बेटी प्रिया गुरव-सरवणकर
● वार्ड 163 (चांदिवली): विधायक दिलीप लांडे की पत्नी शैला लांडे
● वार्ड 153 (चेंबूर): विधायक तुकाराम काते की बहू तन्वी काते
● वार्ड 73 (जोगेश्वरी पूर्व): सांसद रविंद्र वायकर की बेटी दीप्ती वायकर
● वार्ड 113 (भांडुप): विधायक अशोक पाटील के बेटे रुपेश अशोक पाटील
● वार्ड 146 (अनुशक्ती नगर): विधायक तुकाराम काते की बहू समृद्धी गणेश काते
● वार्ड 183 (धारावी): पूर्व सांसद राहुल शेवाळे की भाभी वैशाली नयन शेवाळे
■ आलोचनाएं तेज
ठाकरे गुट की शिवसेना पर परिवारवाद और “सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए नेता” जैसी टिप्पणियां करने वाले एकनाथ शिंदे पर अब अपने ही दल में परिवारवाद को आगे बढ़ाने का आरोप लग रहा है। कई जगहों पर पूर्व नगरसेवकों और वरिष्ठ पदाधिकारियों के घरों में ही टिकट दिए जाने से आम कार्यकर्ताओं में असंतोष गहराता जा रहा है।
मुंबई महानगरपालिका चुनाव में अब परिवारवाद बनाम कार्यकर्ता का मुद्दा केंद्र में आ गया है। इसका चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।


