मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में ‘माटी’ का सम्मान समारोह: पूर्वांचल की अस्मिता, संस्कृति और संवेदना को जोड़ने की सार्थक पहल।

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कौशल विनोद पाठक/मुंबई वार्ता

मुंबई विश्वविद्यालय परिसर के ऑडिटोरियम में संस्था ‘माटी’ द्वारा पूर्वांचल की नौ विशिष्ट हस्तियों का सम्मान समारोह सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। यह आयोजन केवल सम्मान समारोह भर नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी माटी से भावनात्मक संबंध स्थापित करने का एक गंभीर और सकारात्मक प्रयास भी था।कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और बढ़ा दिया। दोनों नेताओं ने अपने संबोधन में पूर्वांचल की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महिमा का उल्लेख करते हुए पूर्वांचल के योगदान को राष्ट्रीय जीवन की एक महत्वपूर्ण धारा बताया।

उन्होंने महाराष्ट्र और पूर्वांचल के संतों, महापुरुषों तथा समाजसेवियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए यह संदेश दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता, संस्कृति और पारस्परिक सम्मान में निहित है।पूर्वांचल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि परिश्रम, संघर्ष, आस्था, साहित्य, संगीत, अध्यात्म और लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान है। काशी, गोरखपुर, बलिया, आजमगढ़, मिर्जापुर, जौनपुर, भदोही, गाजीपुर और आसपास के क्षेत्रों ने देश को अनेक संत, विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी, कलाकार, प्रशासक, सैनिक और समाजसेवी दिए हैं।

मुंबई जैसे महानगर में पूर्वांचल के लोगों ने श्रम, प्रतिभा और ईमानदारी के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। ऐसे में ‘माटी’ द्वारा आयोजित यह सम्मान समारोह पूर्वांचल की इसी पहचान को सम्मान देने का प्रयास कहा जा सकता है।हालांकि कार्यक्रम में अपेक्षा के अनुरूप लोगों की संख्या भले ही कम रही हो, लेकिन किसी भी सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान की सफलता केवल भीड़ से नहीं आंकी जानी चाहिए। कई बार कम उपस्थिति वाले कार्यक्रम भी भविष्य की बड़ी सामाजिक चेतना की नींव बन जाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो ‘माटी’ की यह पहल सकारात्मक, सराहनीय और दूरगामी प्रभाव वाली मानी जा सकती है।मुंबई में बसे पूर्वांचलवासियों के लिए ऐसे आयोजन इसलिए भी आवश्यक हैं क्योंकि महानगर की भागदौड़ में अक्सर व्यक्ति अपनी जड़ों से दूर होता चला जाता है।

भाषा, लोकगीत, परंपरा, संस्कार और सामाजिक आत्मीयता धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलने लगती है। ऐसे समय में ‘माटी’ जैसे मंच लोगों को यह याद दिलाते हैं कि विकास की दौड़ में अपनी मिट्टी की खुशबू को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।कार्यक्रम में पूर्वांचल की नौ हस्तियों का सम्मान इस बात का प्रतीक है कि समाज को आगे बढ़ाने वाले लोगों को सार्वजनिक रूप से पहचान और सम्मान मिलना चाहिए। सम्मान केवल व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि उसके संघर्ष, सेवा, योगदान और प्रेरणा का होता है। जब समाज अपने कर्मयोगियों को सम्मानित करता है, तो नई पीढ़ी को भी समाजहित में कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।

मनोज सिन्हा और देवेंद्र फडणवीस जैसे वरिष्ठ नेताओं द्वारा पूर्वांचल की महिमा का उल्लेख यह दर्शाता है कि पूर्वांचल की सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति को अब व्यापक स्तर पर स्वीकार किया जा रहा है। महाराष्ट्र और पूर्वांचल का संबंध केवल प्रवास का संबंध नहीं है, बल्कि यह श्रम, संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्रीय एकता का संबंध है। महाराष्ट्र की धरती ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों को अवसर दिया है और पूर्वांचल के लोगों ने भी इस धरती के विकास में अपना पसीना और प्रतिभा दोनों अर्पित किए हैं।फिर भी आयोजकों के लिए यह आत्ममंथन का विषय अवश्य है कि भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों को और अधिक जनसंपर्क, व्यापक प्रचार-प्रसार और युवा सहभागिता के साथ आयोजित किया जाए। यदि पूर्वांचल की नई पीढ़ी को ऐसे आयोजनों से जोड़ा जाए, तो यह मंच केवल सम्मान समारोह तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन सकता है।

‘माटी’ की यह कोशिश इस बात का संकेत है कि पूर्वांचल समाज अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को संगठित रूप से सामने लाना चाहता है। यह प्रयास यदि निरंतरता, पारदर्शिता और सामाजिक समावेश के साथ आगे बढ़े, तो मुंबई में पूर्वांचल की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा मिल सकती है।अंततः कहा जा सकता है कि मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित यह सम्मान समारोह पूर्वांचल की अस्मिता, सम्मान और सामाजिक एकता का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। भीड़ कम रही हो सकती है, लेकिन विचार बड़ा था, उद्देश्य सकारात्मक था और संदेश स्पष्ट था—अपनी माटी से जुड़ना ही अपनी पहचान को बचाए रखना है।

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