श्रीश उपाध्याय / मुंबई वार्ता

लगातार टूट-फूट और नेताओं के पलायन से जूझ रही उद्धव बालासाहेब ठाकरे (उबाठा) शिवसेना को संभालने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे उद्धव ठाकरे अब अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए भगवान श्रीराम का सहारा लेने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में तथाकथित “राम-रक्षा आंदोलन” आस्था का अभियान कम और अपनी डूबती राजनीति को बचाने का प्रयास अधिक दिखाई देता है। यह राम-रक्षा नहीं, बल्कि “उबाठा-रक्षा आंदोलन” है।


इतिहास गवाह है कि जिसने निष्कपट भाव से भगवान श्रीराम की शरण ली, उसका कल्याण हुआ। लेकिन जिसने राम के नाम का उपयोग केवल राजनीतिक स्वार्थ, सत्ता और वोट बैंक के लिए किया, उसका अंत भी इतिहास ने देखा है। राम आस्था का विषय हैं, चुनावी रणनीति का औजार नहीं।


‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ की कहावत आज उद्धव ठाकरे पर सटीक बैठती नजर आती है। मुख्यमंत्री रहते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करने वालों पर कार्रवाई की गई, उन्हें जेल भेजा गया। जिन राजनीतिक दलों ने राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया, रामसेतु पर सवाल उठाए, भगवान श्रीराम के अस्तित्व को काल्पनिक बताया और वर्षों तक हिंदू आस्था का उपहास उड़ाया, उन्हीं दलों के साथ सत्ता के लालच में उद्धव ठाकरे ने हाथ मिला लिया। आज वही नेता राम-रक्षा की दुहाई दे रहे हैं।
जनता सब देख रही है और सब समझ रही है। राजनीतिक परिस्थितियां बदलते ही हिंदुत्व का चोला पहन लेना और फिर अवसर निकलते ही उसे उतार फेंकना अब पुराना राजनीतिक हथकंडा बन चुका है। कांग्रेस के साथ खड़े होकर हिंदुत्व की राजनीति करना और फिर राम के नाम पर भावनाएं भड़काने की कोशिश करना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
अब नागपुर से “राम-रक्षा आंदोलन” की शुरुआत की जा रही है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक तथा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को निमंत्रण भेजकर इसे वैचारिक वैधता देने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन केवल निमंत्रण भेज देने से न तो विचारधारा बदल जाती है और न ही वर्षों का राजनीतिक इतिहास मिट जाता है।
आज का हिंदू पहले जैसा नहीं रहा। दशकों की वैचारिक लड़ाई और जागरूकता के बाद समाज यह समझ चुका है कि कौन वास्तव में राम के साथ खड़ा रहा और कौन सत्ता के लिए राम का नाम लेता रहा। इसलिए राम के नाम पर राजनीतिक स्वांग रचकर जनता को भ्रमित करना अब आसान नहीं है।
यदि यह आंदोलन वास्तव में राम और हिंदुत्व की रक्षा के लिए होता तो उसके पीछे वर्षों का वैचारिक और आचरण का इतिहास भी दिखाई देता। लेकिन जब पूरा राजनीतिक रिकॉर्ड इसके विपरीत हो, तब ऐसे अभियान केवल राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कवायद बनकर रह जाते हैं।
राजनीति में जनता सबका हिसाब रखती है। यदि राम का नाम केवल अपने डूबते राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए लिया जाएगा, तो जनता भी उसी अनुपात में जवाब देगी। पार्टी का जनाधार पहले ही लगातार खिसक रहा है। यदि आत्ममंथन के बजाय केवल धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल जारी रहा, तो वह दिन भी दूर नहीं जब राजनीतिक साख, सम्मान और शेष जनसमर्थन भी इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।
सदियों से लोगों की रक्षा राम करते आए हैं। ये उबाठा का मानसिक दिवालियापन ही है कि वे राम रक्षा करने निकले हैं। अयोध्या के राम मंदिर में हुई चढ़ावे की चोरी सर्वथा गलत है, लेकिन उसके विरोध में आंदोलन करना और आंदोलन का नाम राम रक्षा रखना , मानसिक दिवालियापन का ही जीता जागता सबूत है।


