मुंबई वार्ता संवाददाता

मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच विवादों के जल्द निपटारे की दिशा में महाराष्ट्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने मुंबई में 15 पुलिस उपायुक्तों (डीसीपी) को महाराष्ट्र किराया नियंत्रण अधिनियम, 1999 के तहत सक्षम प्राधिकारी नियुक्त किया है। अब संबंधित क्षेत्रों में किरायेदारी, मकान खाली कराने और लीव एंड लाइसेंस (Leave and Licence) समझौते से जुड़े विवादों की सुनवाई डीसीपी कर सकेंगे।


इससे पहले इस अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी के रूप में उप जिलाधिकारियों (डिप्टी कलेक्टर) को अधिकार दिया गया था। नई व्यवस्था के तहत डीसीपी संबंधित मामलों की सुनवाई कर सकेंगे और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को आगे की कार्रवाई के निर्देश भी दे सकेंगे।
राज्य के आवास विभाग ने 31 जुलाई को अधिसूचना जारी कर इस संबंध में पहले जारी सभी अधिसूचनाओं, आदेशों और अन्य संबंधित प्रावधानों को बदल दिया है। अधिसूचना में मुंबई के निर्धारित क्षेत्रों के लिए 15 डीसीपी को सक्षम प्राधिकारी नियुक्त किया गया है।
इस कदम का असर उन मामलों पर भी पड़ सकता है, जिनमें मकान मालिक और लाइसेंसधारी के बीच लीव एंड लाइसेंस समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद मकान खाली करने को लेकर विवाद होता है। ऐसी स्थिति में अब संबंधित डीसीपी के समक्ष मामला रखा जा सकेगा और वे कानून के तहत सुनवाई कर निर्णय ले सकेंगे।
महाराष्ट्र सोसायटीज वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष रमेश प्रभु ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मुंबई में बड़ी संख्या में पुनर्विकास परियोजनाएं चल रही हैं और कई किरायेदारों को किराये के मकानों की जरूरत है। ऐसे समय में विवादों के त्वरित समाधान के लिए यह पहल महत्वपूर्ण है।
अधिनियम की धारा 40(2)(ए) के अनुसार सक्षम प्राधिकारी के रूप में नियुक्त अधिकारी ऐसा पद धारण करता हो या कर चुका हो, जो सरकार की राय में डिप्टी कलेक्टर के पद से कम स्तर का न हो। सरकार ने अधिसूचना में स्पष्ट किया है कि उसके विचार में डीसीपी का पद डिप्टी कलेक्टर से कम स्तर का नहीं है।
महाराष्ट्र किराया नियंत्रण अधिनियम में कुछ मकान मालिक–लाइसेंसधारी और कब्जे से संबंधित मामलों के लिए विशेष वैधानिक व्यवस्था है। डीसीपी को सक्षम प्राधिकारी बनाए जाने से ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के अलावा उपलब्ध इस विशेष तंत्र के जरिए विवादों के निपटारे का रास्ता खुल गया है।


