विंध्य पर्वत पर मां ने किया था रक्तबीज का वध।

Date:

रवीन्द्र मिश्रा । मुंबई वार्ता

यही वह विंध्य पर्वत क्षेत्र है जहां दैत्यों और असुरों में युद्ध हुआ था तथा इसी पर्वत पर मां काली के रूप में प्रकट होकर रक्तबीज नामक असुर का संहार किया था । विंध्य पर्वत क्षेत्र की महिमा बताते हुए काली खोह मंदिर के श्रृंगारिया पुजारी पंडित हेमंत मिश्रा कहा कि विंध्य पर्वत पर मां महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महाकाली के रूप में विराजमान हैं । यह वही योग माया आदि शक्ति हैं जिन्होंने कंस को आकाशवाणी से बता दिया था कि तुझे मारने वाला धरती पर पैदा हो गया है ।

पंडित हेमंत मिश्रा कहा कि आदि काल में देवताओं तथा असुरों में भयंकर युद्ध हुआ । देवताओं के राजा इन्द्र तथा असुरों का स्वामी महिषासुर में भयंकर लड़ाई हुई। उस लड़ाई में महिषासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया ।उसने सूर्य, इन्द्र, वायु, चंद्रमा,यम वरुण सहित सभी देवताओं का अधिकार छीन लिया । देवताओं को स्वर्ग लोक से भगा दिया गया ।वे मनुष्य बन कर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। सभी देवताओं ने भगवान विष्णु तथा शिव जी के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई।जिसे सुनकर भगवान विष्णु क्रोधित हो गए ।उनके क्रोध से महामाया के रूप में एक तेज़ उत्पन्न हुआ ।

इस देवी के साथ महिषासुर युद्ध करने लगा ।हजार साल तक युद्ध चलता रहा। इस बीच रक्तबीज नामक एक दैत्य देवी से लड़ाई करने आया । देवी के त्रिशूल और खड्ग से जब उस पर प्रहार किया जाता और उस प्रहार से जब उसके शरीर से जो खून निकलता उससे अनगिनत रक्त बीज पैदा हो जाते । तब महामाया ने काली की रुप धारण किया । रक्तबीज का जो भी रक्त निकलता मां उसे पी जाती । इसलिए यहां पर मां का मुंह उर्धाकार है । यहां मुंह में जो भी भोग प्रसाद डाला जाता है वह कहां जाता है वह भी बड़ा रहस्य है ।प्रसाद कहां जाता है इसका अभी तक किसी को पता नहीं चला । आज भी इस पहाड़ की मिट्टी गेरु की तरह लाल है ।यह स्थल गेरु वहिया के नाम से प्रसिद्ध है ।

काली खोह की महिमा बताते हुए पंडित हेमंत मिश्रा कहा कि मंदिर के पीछे एक कूप है भक्त जिसे कर्ण कूप कहते हैं । इस कुंए का पानी पीने से पेट के सभी रोग,विकार दूर हो जाते हैं । काली खोह मंदिर के पीछे डायनियां मां का एक छोटा मंदिर हैं ।इस देवी के दर्शन से प्रेत वाधा से लोगों को मुक्ति मिलती है । यहां तांत्रिक पहाड़ी से छोटे छोटे पत्थर इकट्ठा कर एक घर बनाते जहां प्रेतों को स्थान दे दिया जाता है । मंदिर से ही श्रद्धालु त्रिकोणीय परिक्रमा शुरू करते हैं । उपर पहाड़ चढ़ने पर गेरुवहवा तालाब है । वहां पर भगवान विष्णु का एक सुन्दर मंदिर है । इस मंदिर में लोगों का खूब विश्वास है ।कार्तिक पुर्णिमा जिसे लोग कोजागिरी पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं । ऐसी मान्यता है कि उस दिन यहां गाय के दूध में खीर पका कर चांदनी रात में रख कर जो उसे सुबह खाएगा ।उस प्रसाद के खाने से शरीर पर पड़े सफेद दाग जिसे लोग फूल या कोढ़ कहते हैं वह निकल जाता है । काली खोह के पुजारी हेमंत मिश्रा बताते हैं कि यह क्षेत्र तांत्रिको के लिए सिद्ध पीठ है । यही कारण है कि यहां चारों नवरात्रों में साधक पहाड़ों की कंदराओं, गुफाओं में साधना करते देखे जाते हैं । लेकिन मज़े की बात यह कि यहां साधना करने आया व्यक्ति अपना परिचय किसी को नहीं देता । गेरुवहिया होते हुए भक जब अष्टभुजा देवी के दर्शन कर मां विंध्यवासिनी धाम पहुंचते हैं तब उनका त्रिकोणीय दर्शन पूरा होता है । नवरात्र के दौरान काली खोह की काली मां का मंदिर 24 घंटे भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

प्रमुख खबरे

More like this
Related

EVM जांच से बच रहा है चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी: नसीम खान।

मुंबई वार्ता संवाददाता कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और पूर्व...

संजय निषाद और बाबा दुबे की मुलाकात से बदली बदलापुर की राजनीति।

मुंबई वार्ता/ शिव पूजन पांडेय उत्तर प्रदेश के कैबिनेट...

मानखुर्द शिवाजी नगर में वोटर मैपिंग संकट: स्टाफ की कमी से धीमी प्रक्रिया, अबू आसिम आज़मी।

श्रीश उपाध्याय/मुंबई वार्ता मानखुर्द शिवाजी नगर विधानसभा क्षेत्र में...