वैश्विक पतन के चार स्तंभ और हमारा आत्मघाती मौन।

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मुंबई वार्ता/ ज्ञानेन्द्र मिश्र/ लेखक

विश्व आज से नहीं, बल्कि पिछले पांच दशकों से एक असाध्य और विमर्शहीन संकट के भंवर में फंस चुका है। तथाकथित “आधुनिकता और सभ्यता” का वह चश्मा हमारी आंखों पर इतनी बेरहमी से बांध दिया गया है कि हमें अपनी ही शारीरिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के मिटने का आभास तक नहीं हो रहा।यदि आप वैश्विक क्षितिज पर मंडरा रही चार सबसे बड़ी और विकराल समस्याओं पर ईमानदारी से दृष्टि डालेंगे, तो पाएंगे कि ये महाविनाशक सच हमारे सामने नग्न अवस्था में खड़े हैं—फिर भी हम सबने शुतुरमुर्ग की भांति अपनी गर्दन रेत में छुपा रखी है। हमने आंखें मूंद ली हैं और खुद से तथा पूरी दुनिया से एक महाझूठ बोल रहे हैं कि *”सब ठीक है”*, जबकि यथार्थ इसके ठीक विपरीत, सर्वनाश की कगार पर खड़ा है।

■ मानवता के अस्तित्व को निगलने वाली ये चार गंभीर और वास्तविक समस्याएं इस प्रकार हैं:

४. अमेरिकी दादागिरी: आवश्यक अराजकता या अनिवार्य बुराई?*माना कि अमेरिका की आक्रामक और हस्तक्षेपकारी विदेश नीति से आज दुनिया के कई राष्ट्र त्रस्त हैं। किंतु यह अकाट्य सत्य भी है कि यदि अमेरिका का यह स्वच्छंद, आधिपत्यवादी और अति-शक्तिशाली स्वभाव न होता, तो यह विश्व अराजकता की भेंट चढ़कर कब का समाप्त हो चुका होता।आज यदि किसी ने इस्लाम के कुत्सित और कट्टरपंथी व्यवहार को, चीन की साम्राज्यवादी आक्रामकता को और यूरोप के श्रेष्ठता-बोध को खुलेआम चुनौती दी है, तो वह केवल अमेरिका है। इस वैश्विक व्यवस्था को अनुशासन में रखने के लिए आज भी एक ‘राउडी राजा’ (अंकुश लगाने वाली महाशक्ति) की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी रेगिस्तान में पानी की। संयुक्त राष्ट्र (UN) की दयनीय स्थिति पर जरा अपने हृदय पर हाथ रखकर विचार कीजिए—क्या वह इस हिंसक दुनिया का संचालन करने में सक्षम है? कतई नहीं!

३. यूरोप का स्वार्थ और श्रेष्ठता का मिथ्या अहंकार*यूरोप का यह महाद्वीप आज भी अपनी औपनिवेशिक मानसिकता और ‘श्वेत श्रेष्ठता’ की कुंठा से बुरी तरह ग्रसित है। सदियों तक दुनिया के बड़े भूभाग पर क्रूरतापूर्वक राज करने के कारण वह वर्चस्ववादी स्वभाव उनकी नस-नस में समा चुका है—और इस अहंकार को मिटने में अभी और सदियां लगेंगी। संतोष की बात यह है कि अमेरिका समय-समय पर उन्हें उनकी वर्तमान वैश्विक औकात का आईना दिखा रहा है। हमें बस सही समय की प्रतीक्षा करनी है।

२. चीन का साम्राज्यवादी व्यवहार: अहंकार और राष्ट्रीय संकल्प*चीन को ऐतिहासिक रूप से वह वैश्विक सम्मान कभी नहीं मिला, जिसके वह सपने देखता रहा है; इसी हताशा और कुंठा के गर्भ से उसका वर्तमान साम्राज्यवादी और आक्रामक चरित्र जन्मा है।लेकिन चीन की सबसे बड़ी ताकत उसका राष्ट्रवादी और अडिग नेतृत्व है। पिछले पचास वर्षों से वहां ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से ओतप्रोत शासन प्रणाली ने देश को एक सूत्र में बांधा है। वे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं—जो कि वैश्विक शांति के लिए, विशेषकर उसके पड़ोसियों के लिए एक गंभीर अभिशाप है।इसका समाधान केवल एक है: हमें और चीन के पड़ोसी राष्ट्रों को भी रोने के बजाय स्वयं को सामर्थ्यवान बनाना होगा। राष्ट्रवादी विचारधारा, अटूट ईमानदारी और ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प को आत्मसात कर कठोर निर्णय लेने होंगे।

१. इस्लाम का वैचारिक विस्तार और सभ्यतागत संकट*पूरी दुनिया ने इस सबसे बड़े और लाइलाज संकट के मूल से अपनी आंखें फेर ली हैं। तथाकथित सेकुलरिज्म का वह काला चश्मा पहना दिया गया है, जिसके कारण इस्लाम-जनित वैश्विक समस्याओं पर बात करना भी अपराध मान लिया गया है।आधुनिक इतिहास पढ़ाते समय हमारे बच्चों को कभी यह सत्य नहीं बताया गया कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के बाद से किस प्रकार पैशाचिक और असहिष्णु तरीकों से सभ्यताओं को रौंदने की परंपरा का आरंभ हुआ।आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में जब आप सीधे युद्ध या ताकत के बल पर किसी राष्ट्र को नहीं जीत सकते, तो रणनीति बदल चुकी है। इस्लाम के अनुयायी शरणार्थी या पीड़ित बनकर अन्य देशों में प्रवेश करते हैं। वहां वे दया की भीख मांगते हैं, मुफ्त की सरकारी सहायता पर पलते हैं, अपनी आबादी बढ़ाते हैं, नागरिकता हासिल करते हैं और फिर मताधिकार (Democracy) का हथियार इस्तेमाल कर उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पलट देते हैं।जहाँ लोकतांत्रिक कब्जा संभव नहीं होता, वहाँ वे 20% की जनसांख्यिकीय सीमा पार करते ही अपराध, भय और कट्टरता के बल पर उस राष्ट्र की मूल संस्कृति को अंदर से खोखला कर बर्बाद कर देते हैं। इतिहास के पिछले चौदह सौ वर्षों का पन्ना-पन्ना इस शाश्वत सत्य की गवाही दे रहा है।भविष्य की चेतावनी और हमारी ऐतिहासिक भूल।

“जो समाज अपने इतिहास के पन्नों को नजरअंदाज करता है, यकीन मानिए, क्रूर इतिहास स्वयं को दोहराने के लिए पुनः लौट आता है। इतिहास केवल अतीत की घटनाएं नहीं हैं, यह भविष्य की राह दिखाने वाला वह प्रकाशस्तंभ है जो हमें दूरदृष्टि देता है। यदि आप इतिहास के इन निर्मम सत्यों को देखने से इंकार करते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के सर्वनाश के सबसे बड़े अपराधी आप स्वयं होंगे। क्या आप यही चाहते हैं कि आपकी आने वाली नस्लें गुलाम बन जाएं?यदि आपका उत्तर “*नहीं*” है, तो अपनी आंखों की पट्टियां खोलिए। इतिहास का गहन अध्ययन कीजिए और आने वाले कालखंड में अपनी संस्कृति और संतानों को बचाने के लिए हुंकार भरिए।इस लाइलाज समस्या के समूल नाश का मार्ग कठोर निर्णयों से होकर गुजरता है। हमारी सनातन परंपरा भी यह सिखाती है कि पुराने और सड़े हुए का विनाश हुए बिना न तो नई दृष्टि का जन्म होता है और न ही नई सृष्टि का आरंभ।

उठिए, जागिए और ललकारिए!*यह राष्ट्र आपको पुकार रहा है, आपकी आने वाली पीढ़ियां आपके संकल्प की प्रतीक्षा कर रही हैं। अपनी संतानों को यूं ही विनाश की अंधी आग में झोंककर चले जाना—कभी भी मोक्ष का मार्ग नहीं हो सकता।आप चाहे जितने कर्मकांड कर लें, जितनी पूजा-पाठ कर लें, यदि आप अपनी आने वाली नस्लों को बचाने के लिए एक कड़ा संघर्ष नहीं करते, तो आने वाली पीढ़ियों के अभिशाप से आप अनंत काल तक साक्षात नरक की अग्नि में जलते रहेंगे।अब और मौन मत रहिए—जागिए, पहचानिए और राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़े हो जाइए!

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