मुंबई वार्ता संवाददाता

कांदिवली (पूर्व) में आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञानयज्ञ के तृतीय पावन दिवस पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज के प्रेरक प्रवचनों से संपूर्ण वातावरण भक्ति, शांति और वैदिक चेतना से परिपूर्ण हो उठा। श्रद्धालुओं ने भागवत कथा के माध्यम से जीवन को सरल, सात्त्विक और सार्थक बनाने वाले संदेशों को आत्मसात किया।


अपने सहज प्रवचन में स्वामी जी ने कहा कि सनातन परंपरा में संकल्प का विशेष महत्व है। बिना संकल्प के किया गया कर्म दिशाहीन हो जाता है। भारतीय मनीषा में कहा गया है—“संकल्पो हि मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”(संकल्प ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।)स्वामी जी ने गीता के माध्यम से समझाया कि अहंकार और वासना मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। विषयों का अधिक चिंतन मन को अस्थिर कर देता है।


गीता का प्रसिद्ध कथन है—“सङ्गात् संजायते कामः।”(आसक्ति से वासना उत्पन्न होती है।)उन्होंने बताया कि वासना से क्रोध और फिर विवेक का नाश होता है। यही बात तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में अत्यंत सरल शब्दों में कही है—“काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।”स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी ने कहा कि जब मन वासना और अहंकार से घिर जाता है, तब व्यक्ति उचित-अनुचित का भेद भूल जाता है। मानस में स्पष्ट कहा गया है—“जाके प्रिय न राम बैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम।”अर्थात जो राम (धर्म और मर्यादा) के प्रिय नहीं हैं, उनसे दूरी ही श्रेयस्कर है।सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए स्वामी जी ने कहा कि संगति मनुष्य के जीवन को गढ़ती है।
इस संदर्भ में संस्कृत का प्रसिद्ध सूत्र है—“सत्संगत्वे निस्संगत्वं।”(सत्संग से आसक्ति का नाश होता है।)और तुलसीदास जी कहते हैं—“बिनु सतसंग विवेक न होई।”स्वामी जी ने कहा कि भागवत कथा और सत्संग मनुष्य को भोग से योग, अहंकार से सेवा और अशांति से शांति की ओर ले जाते हैं।
कार्यक्रम का आयोजन एडवोकेट जे. डी. सिंह, श्री राम मणि मिश्र, श्री ओम प्रकाश सिंह, श्री हरिश्चंद्र शुक्ल, प्रमोद दुबे, डॉ. दिनकर दुबे, संचित यादव, अनिल पांडेय, सूरज प्रताप सिंह देवड़ा सहित अन्य सहयोगियों द्वारा किया जा रहा है।प्रो. दयानंद तिवारीप्रवक्ता, काशी धर्म पीठमोबाइल : 9987123330



जय श्री राम