ज्ञानेंद्र मिश्र/स्तंभकार/मुंबई वार्ता

आईए, पिछले 25 वर्षों में प्रमुख आतंकवादी हमले पर एक नजर डालते हैं;
अगस्त 2000: कश्मीर नरसंहार (अमरनाथ तीर्थयात्रा हमला)
दिसंबर 2001: भारतीय संसद पर हमला
सितंबर 2002: अक्षरधाम मंदिर हमला
मार्च 2003: मुंबई ट्रेन विस्फोट
अक्टूबर 2005: दिल्ली विस्फोट
जुलाई 2006: मुंबई ट्रेन बम विस्फोट
जुलाई 2008: बेंगलुरु सिलसिलेवार विस्फोट
नवंबर, 2008: मुंबई हमले (26/11)
फरवरी 2010: पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट
जुलाई 2011: मुंबई तिहरा बम विस्फोट
जनवरी 2016: पठानकोट वायुसेना अड्डा हमला
सितंबर 2016: उरी सेना अड्डा हमला
फरवरी 2019: पुलवामा हमला
अप्रैल 2025: पहलगाम हमला
इन हमलों में कम से कम 936 लोगों की जान गई, और यह एक रूढ़िगत(कंजरवेटिव) आंकड़ा है।
आतंकवाद का सामान्य पैटर्न
इन सभी घटनाओं में दो बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं:
इस्लामी जिहादी आतंकवाद: इन हमलों के पीछे इस्लामी जिहादी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
पाकिस्तान की भूमिका: सुरक्षा एजेंसियां और सरकारी अधिकारी हर बार इन हमलों के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हैं- पाकिस्तान जिम्मेदार है भी लेकिन 100% नहीं, सिर्फ रिसोर्स उपलब्ध कराती है पाकिस्तान, सर लॉजिस्टिकल सपोर्ट और इंटेलिजेंस तो भारत के अंदर से मिलता है- नहीं???
हर आतंकी हमले के बाद सरकार और सुरक्षा एजेंसियां तुरंत पाकिस्तान पर उंगली उठाती हैं। खासकर 2014 के बाद, कई मामलों में पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई भी की गई। हालांकि, इसके बाद जो होता है, वह एक चक्रीय पैटर्न है:
जनता में पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी होती है।
राजनीतिक दल इसे अपने पक्ष में भुनाते हैं!
धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है, और अगले हमले तक लोग इसे भूल जाते हैं।
क्या यह चक्र अनंतकाल तक चलना चाहिए?
हर बार एक ही प्रक्रिया दोहराई जाती है:
- इस्लामी आतंकवादी हमला होता है।
- निहत्थे और मासूम लोग, खासकर हिंदू, मारे जाते हैं।
- सरकार पाकिस्तान पर आरोप लगाती है और कुछ सीमित कार्रवाइयां करती है।
- जनता में राष्ट्रवादी जोश बढ़ता है, और राजनीतिक दल इसका लाभ उठाते हैं।
- फिर मामला ठंडा पड़ जाता है।
पिछले 70 वर्षों का इतिहास देखें तो यही चक्र बार-बार दोहराया गया है। क्या यह उचित है कि हिंदू समाज केवल आतंकवाद का शिकार बनकर, राजनीतिक दलों के लिए सत्ता का साधन बनकर, या डर में जीने के लिए मजबूर हो?
पाकिस्तान को दोष देना पर्याप्त नहीं
पाकिस्तान को बार-बार दोष देना अब समाधान नहीं है। यदि आतंकवादी भारत में प्रवेश कर रहे हैं, तो हमारी सीमा सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। हमारे सैनिक, इलेक्ट्रॉनिक फेंसिंग, और हवाई निगरानी कहां हैं? यदि हम केवल बाहरी ताकतों को जिम्मेदार ठहराकर अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं, तो सिर्फ पाकिस्तान ही क्यों? अमेरिका, रूस, या इजरायल के हथियार और उपकरण भी तो आतंकवादियों के पास मिलते हैं।
इसलिए, हमें अपनी सीमा सुरक्षा को और मजबूत करने की आवश्यकता है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बाहरी है, या आंतरिक?
आंतरिक सुरक्षा: सबसे बड़ा खतरा
भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा उसकी आंतरिक सुरक्षा को है। पहलगाम हमला इसका ताजा उदाहरण है। क्या वाकई यह मानना उचित है कि पहलगाम हमले के लिए केवल पाकिस्तान जिम्मेदार है?
वास्तविकता यह है कि इस हमले के लिए कई आंतरिक कारक जिम्मेदार हैं:
सीमा सुरक्षा में चूक: आतंकवादियों को भारत की सीमा में प्रवेश करने की अनुमति कैसे मिली?
स्थानीय सहयोग: कश्मीर के स्थानीय लोगों ने इन आतंकवादियों को न केवल शरण दी, बल्कि उन्हें भोजन, रास्ता, और सुरक्षा भी प्रदान की।
स्लीपर सेल्स: अर्थात आतंकियों के जिहादियों के मौन सहयोगी- जब जहां जितना मौका मिला मदद कर दिया, अन्यथा मौन रहे, मौन समर्थन देते रहे।
पूरे भारत में आतंकी घटनाओं के पीछे स्थानीय स्लीपर सेल्स की अहम भूमिका रही है, जो जिहादी आतंकवादियों को सहायता प्रदान करते हैं।
पहलगाम हमले में आतंकवादी लगभग 250 किलोमीटर पैदल चलकर आए, और इस दौरान इन 365 दिनों में काम से कम 10000 लोगों से मुलाकात हुई होगी, उन्हें इन्हीं स्थानीय लोगों ने हर कदम पर मदद की-बगैर स्थानीय कश्मीरी के मदद के इतनी दुर्दांत हिंदू नरसंहार की घटना संभव ही नहीं है
यही पैटर्न भारत की हर आतंकी घटना में देखा जा सकता है।
वास्तविक खतरा: जिहादी मानसिकता
भारत की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा उन लोगों से है जो गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर भारत के संसाधनों का उपयोग करते हैं, लेकिन देश की पीठ में छुरा घोंपते हैं। पहलगाम हमले के बाद सरकार ने अवैध रूप से रह रहे पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिकों को चिह्नित किया। लेकिन सवाल यह है कि यदि ये लोग पहले से ही सुरक्षा एजेंसियों की नजर में थे, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं की गई? क्या सुरक्षा एजेंसियों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं?
सरकार के प्रयास: क्या ये पर्याप्त हैं?
वर्तमान सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जैसे:
सीएए और एनआरसी: अवैध प्रवासियों को चिह्नित करने के लिए।
धारा 370 और 35ए का निरस्तीकरण: जम्मू-कश्मीर में स्थिरता लाने के लिए।
समान नागरिक संहिता (UCC): सामाजिक एकरूपता के लिए।
चुनाव सुधार विधेयक: लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए।
वक्फ बोर्ड संशोधन बिल विधेयक सामान्य जनमानस को अत्याचार से बचने के लिए
ये सब कदम सराहनीय हैं, लेकिन क्या ये भारत को अगले 10-20 वर्षों तक सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त हैं?
लोकतंत्र का खतरा: संख्या बल
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां सत्ता का आधार वोटों की संख्या है। यदि कोई समुदाय संख्या बल के आधार पर सत्ता हासिल कर लेता है और शरिया कानून लागू करता है, तो भारत का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। आपको आपके बेटे को छोटा पजामा बिना मूछ की दाढ़ी और विशेष अंग भांग तथा कलमा पढ़ना पड़ेगा आपकी बहन बेटी मां को बुर्का पहनना होगा और सभी को गुमान खाना होगा– यह विचार भयावह है, लेकिन असंभव नहीं। और आप जानते हैं दुनिया में कोई भी ताकत आपको बचाने नहीं आएगी क्योंकि आपने यह शरिया कानून संसद के माध्यम से लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत लागू किया हुआ होगा। यदि वर्तमान व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किए गए, तो यह स्थिति निश्चित रूप से उत्पन्न हो सकती है।
समाधान: ठोस और दीर्घकालिक कदम
भारत को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
अवैध प्रवासियों की पहचान: सभी अवैध पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, और रोहिंग्या प्रवासियों को चिह्नित किया जाए।
स्थानीय सहयोगियों पर कार्रवाई: उन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो जो आतंकवादियों को सहायता प्रदान करते हैं।
छद्म-धर्मनिरपेक्षता पर अंकुश: छद्म-धर्मनिरपेक्ष (psedo-secular) तत्वों को चिह्नित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
जनसंख्या नियंत्रण विधेयक: यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
इस विधेयक में निम्नलिखित प्रावधान होने ही चाहिए:
क)
यदि दो बच्चों की सीमा निर्धारित है, तो तीसरे बच्चे के जन्म पर माता-पिता की सभी सामाजिक सुविधाएं (जैसे राशन, सरकारी योजनाएं) वापस ले ली जाएं।
ख)
ऐसे माता-पिता को मताधिकार से वंचित किया जाए।
ग)
नवजात बच्चे को भी भविष्य में मताधिकार और सामाजिक सुविधाओं से वंचित रखा जाए।
#जनसंख्या नियंत्रण विधेयक: एकमात्र स्थायी समाधान
सीएए, एनआरसी, धारा 370, और समान नागरिक संहिता जैसे कानून अस्थायी राहत प्रदान कर सकते हैं, जैसे कि एक मरीज को सर्जरी से पहले दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं जो निश्चित है गहन सर्जरी के लिए नितांत आवश्यक है। लेकिन भारत की सुरक्षा के लिए जो गहन सर्जरी चाहिए, वह है #जनसंख्या नियंत्रण विधेयक। यह विधेयक विशेष समुदायों के संख्या बल को नियंत्रित करेगा और उनकी वोटिंग शक्ति को सीमित करेगा, जिससे भारत की लोकतांत्रिक और भौगोलिक अखंडता बनी रहेगी।
निष्कर्ष
भारत की सुरक्षा को बाहरी और आंतरिक दोनों खतरों से निपटने की आवश्यकता है। पाकिस्तान को दोष देना बंद कर हमें अपनी सीमा सुरक्षा और आंतरिक निगरानी को मजबूत करना होगा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है जनसंख्या नियंत्रण विधेयक, जो भारत को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का एकमात्र स्थायी समाधान है। यदि हम अभी नहीं चेते, तो भविष्य में हमारी आने वाली पीढ़ियों को भयावह परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।


