मुंबई वार्ता /श्रीश उपाध्याय

महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में नन ऑफ द एबव (नोटा) विकल्प के समुचित क्रियान्वयन की मांग को लेकर बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह याचिका छत्रपति संभाजीनगर निवासी सुहास वानखेड़े ने दाखिल की है।यह जनहित याचिका पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ में दायर की गई थी।


मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए इसका उल्लेख किया गया, जिस पर न्यायालय ने दो सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सहमति प्रदान की।


आगामी 15 जनवरी अर्थात 8 दिन बाद महानगर पालिकाओ के लिए मतदान किया जाने वाला है जबकि उच्च न्यायालय ने सुनवाई के लिए दो हफ्ते बाद का समय दिया है। ऐसे हालात में यह याचिका बेमानी सी प्रतीत हो रही है ।
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ताओं सचिंद्र शेट्ये और अक्षय पनसारे ने भी न्यायालय को बताया कि नगर परिषद चुनावों के परिणाम पहले ही घोषित किए जा चुके हैं, इसलिए यह याचिका अब निष्प्रभावी हो चुकी है।
■ याचिका में क्या मांग की गई है ?
याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) द्वारा निर्विरोध उम्मीदवारों को बिना वास्तविक मतदान कराए विजेता घोषित किया जाना मतदाताओं के असहमति व्यक्त करने के संवैधानिक अधिकार का हनन है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक ही उम्मीदवार मैदान में हो, तब भी मतदाताओं को मतदान करने और नोटा का विकल्प चुनने का अधिकार मिलना चाहिए।समानता और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का प्रश्नयाचिका के अनुसार, केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा के संयोग के आधार पर मतदाताओं के साथ असमान व्यवहार किया जा रहा है, जो संविधान के समानता के अधिकार तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की मूल भावना के विरुद्ध है।
याचिका में कहा गया है कि नोटा मतदाता के उस अधिकार का प्रतीक है, जिसके माध्यम से वह किसी भी उम्मीदवार को अस्वीकार कर सकता है।सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग के निर्देशों का उल्लेखयाचिका में वर्ष 2004 के सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का उल्लेख किया गया है, जिसमें मतदाता के असहमति दर्ज करने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
साथ ही, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग के वर्ष 2018 के आदेश का भी हवाला दिया गया है, जिसमें नोटा को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक “काल्पनिक निर्वाचन उम्मीदवार” के रूप में मान्यता दी गई थी।उस आदेश के अनुसार, यदि नोटा को किसी भी प्रत्याशी से अधिक वैध मत प्राप्त होते हैं, तो किसी भी उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित नहीं किया जाएगा और उस सीट के लिए नामांकन प्रक्रिया से पुनः चुनाव कराया जाएगा।
याचिका के अनुसार, ये निर्देश सामान्य तथा उपचुनाव—दोनों पर तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने थे।निर्वाचन आयोग पर आदेशों की अनदेखी का आरोपयाचिकाकर्ता ने बताया कि 2 दिसंबर को 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों के लिए घोषित चुनाव कार्यक्रम के बाद उन्होंने निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को अक्षरशः लागू करने का आग्रह किया था। इसके बावजूद, 20 दिसंबर को प्रस्तावित 24 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के लिए जारी संशोधित चुनाव कार्यक्रम में भी नोटा से संबंधित निर्देशों को लागू नहीं किया गया।
याचिका में कहा गया है कि इस कारण मतदाताओं को यह अवसर नहीं मिला कि वे किसी उम्मीदवार का समर्थन करें, उसे अस्वीकार करें अथवा नोटा का चयन करें।‘वॉकओवर’ व्यवस्था पर गंभीर आपत्तियाचिका में कहा गया है कि बिना मतदान के निर्विरोध रूप से विजेता घोषित करना तथाकथित “वॉकओवर” व्यवस्था को बढ़ावा देता है, जिससे योजनाबद्ध नामांकन वापसी और कृत्रिम रूप से निर्विरोध चुनाव की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। इससे लोकतांत्रिक पारदर्शिता और जन निगरानी कमजोर पड़ती है।
■ याचिका में की गई प्रमुख मांगें
याचिका में न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि नगर परिषद, नगर पंचायत, जिला परिषद और पंचायत समिति से संबंधित चुनाव नियमों को “असंवैधानिक, अवैध एवं शून्य” घोषित किया जाए। साथ ही, अमरावती, जलगांव, धुले, बीड और कोल्हापुर में उन सीटों पर वास्तविक मतदान कराने का निर्देश दिया जाए, जहां उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया है।
इसके अतिरिक्त, राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह सभी रिटर्निंग अधिकारियों और चुनाव कर्मियों के लिए समान एवं स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि भविष्य में नगर निगम, नगर पंचायत और जिला परिषद चुनावों में यदि केवल एक ही उम्मीदवार शेष रहे, तब भी नोटा के साथ वास्तविक मतदान कराया जाए।


