हम कैसे नववर्ष मनाएं ?

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सुरेश मिश्र/कवि/मुंबई वार्ता

यह अपना त्योहार नहीं है,

जीवन का आधार नहीं है,

नया वर्ष है दुनिया खातिर

सनातनी संस्कार नहीं है।

माना इससे युद्ध नहीं है,

कोई इससे क्रुद्ध नहीं है,

जुड़े आस्था इससे कैसे ?

काम यहां कुछ शुद्ध नहीं है।

न दिन बदला,समय बदला,

न मौसम का मलय बदला,

न खेतों में फसल बदली,

न लोगों का हृदय बदला।

जीत नहीं है,हार नहीं है,

शक-संवत का द्वार नहीं है,

नया वर्ष कहने को बाबू,

कोई भी आधार नहीं है।

नया जोश-उल्लास नहीं है,

नए बोध की प्यास नहीं है,

वही पुरानी कक्षाएं हैं-अभी तो नई क्लास नहीं है।

वही जनवरी, वही दिसंबर,वही है धरती, वही है अंबर,

कोहरा-ठंडी- ओस वही है नए शगुन के नहीं स्वयंवर।

नई-नई कुछ आस नहीं है,दिखता भी कुछ खास नहीं है,

ठंडा-ठंडा दिखे चतुर्दिक-ये कोई मधुमास नहीं है।

फिर नववर्ष मनाएं कैसे?पीने का व्यापार नहीं है,

राम-कृष्ण-विक्रमादित्य से इसका कोई तार नहीं है।

जो पंचांग बताए बाबू,

क्षण इत-उत ना जाए बाबू,

एक धर्म जो वैज्ञानिक है,

विश्व गुरू कहलाए बाबू।

इसका पारावार नहीं है,

कोई लंबरदार नहीं है,

चैत्र मास में सब कुछ बदले

नए साल का द्वार यही है।

नाचो गाओ खुशी मनाओ,

नया कलेंडर घर में लाओ,

लड़ियां-फुलझड़ियां चमकाओ,

छुट्टी है पिकनिक पर जाओ।

नहीं बधाई लेंगे बाबू,नहीं बधाई देंगे बाबू,

वरना इसका बहुत बुरा फलजीवन में भुगतेंगे बाबू।

पर्वों का है देश तुम्हारा,प्रकृति-किसानी-भाईचारा,

ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचा जब,वो दिन है नववर्ष हमारा।

ये गीता का सार नहीं है,अंग्रेजी व्यापार नहीं है,

नया वर्ष कहने को बाबू,कोई भी आधार नहीं है।

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