कितना कारगर होगा जाति गणना का दांव

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी का कहना है कि हम जातीय गणना अवश्य कराएंगे और उससे मिले आंकड़ों के आधार पर जिस जातीय समूह को जितने अधिक आरक्षण की जरूरत होगी, उसे उतना आरक्षण देंगे। उनका कहना है कि सर्वोच्च अदालत ने 50 प्रतिशत आरक्षण की जो अधिकतम सीमा तय कर रखी है, सत्ता में आने के बाद उसे हटा देंगे।

ऐसा मुमकिन नहीं लगता। क्योंकि कांग्रेस सत्ता में आ भी गई तो सरकार के फैसले की सुप्रीम कोर्ट समीक्षा जरूर करेगा। वह संविधान की मूल रचना की तय नीति के बाहर नहीं जायेगा। इसके बावजूद राहुल गांधी लोगों से कह रहे हैं कि हम आपके लिए चांद तोड़कर ला देंगे। तो साफ़ है कि वे वोट के लिए झांसा दे रहे हैं।

कांग्रेस ने झांसा देने को एक कला की तरह विकसित किया है।

आजादी के तुरंत जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘‘कालाबाजारियों को निकटतम लैम्पपोस्ट पर फांसी दे दी जानी चाहिए।’’ लोगों में उम्मीद जगी कि अब भ्रष्टाचार से राहत मिलेगी। लेकिन हुआ ठीक उलटा। पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ की तो भारतीय सेना को जीपों की भारी कमी महसूस हुई। सरकार ने तय किया कि ब्रिटेन से तत्काल दो हजार जीपें खरीदी जाएं। लेकिन ब्रिटेन में उच्चायुक्त वी.के.कृष्ण मेनन को जो सन्देश भेजा गया उसमें प्रधानमंत्री कार्यालय ने उस कंपनी का नाम भी बता दिया जिससे जीपें खरीदनी थीं। जबकि उस कंपनी की कोई साख नहीं थी।

मेनन ने उस कंपनी को एक लाख 72 हजार पाउंड का अग्रिम भुगतान भी कर दिया। कंपनी ने दो हजार में से सिर्फ 155 जीपें भारत भेजीं। वे भी इस्तेमाल लायक नहीं थीं। उन्हें बंदरगाह से चलाकर गैरेज तक भी नहीं ले जाया जा सकता था।

उस पर संसद में भारी हंगामा हुआ। अनंत शयनम अयंगार की अध्यक्षता जांच कमेटी बनी।
कमेटी ने अपनी रपट में कहा कि जीप खरीद की प्रक्रिया गलत थी। इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। पर,नेहरू सरकार ने न्यायिक जांच नहीं कराई। संसद में 30 सिंतबर, 1955 को फिर मामला उठा तो तत्कालीन गृहमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने कहा कि हमारी सरकार ने इस केस को बंद करने निर्णय किया है। किसी को इस निर्णय से असंतोष है तो अगले आम चुनाव में इसे मुद्दा बनाकर देख ले।

इंदिरा गांधी की सरकार 1969 में उस समय अल्पमत में आ गई, जब कांग्रेस में विभाजन हो गया।
कम्युनिस्टों, डी.एम.के आदि की बैसाखी के सहारे उनकी सरकार किसी तरह घिसट रही थी।
ऐसे मौके पर इंदिरा गांधी ने ‘‘गरीबी हटाओ’’ का नारा दिया। लोग उनके झांसे में आये और 1971 के चुनाव में कांग्रेस को लोक सभा में पूर्ण बहुमत मिला।

इस जीत के बाद वह गरीबी हटाने का वायदा भूल गईं। उन्होंने पहला सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम स्वहित में किया। अपने पुत्र संजय गांधी को मारुति कारखाने का उपहार दे दिया। योजना आयोग ने
विरोध किया तो उसका पुनर्गठन कर दिया गया।

उन्होंने जब 14 निजी बैकों का राष्ट्रीयकरण किया तो लोगों को लगा कि वे गरीबी हटाना चाहती हैं और पूंजीपतियों का असर कम करना चाहती हैं। लेकिन हुआ उसके उलट। जे पी आंदोलन में इस बात को लेकर सवाल-जवाब हुए तो उन्होंने कहा- “भ्रष्टाचार सिर्फ भारत में ही नहीं है । यह तो विश्वव्यापी परिघटना है।”

1984 में राजीव गांधी ने प्रधान मंत्री बनते ही ‘‘सत्ता के दलालों’’ के खिलाफ अभियान चलाने की घोषणा कर दी। उन्होंने यह भी कहा था कि केंद्र सरकार 100 पैसे भेजती है,पर उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंच पाते हैं। वह जब कांग्रेस महा मंत्री थे तो इसी बिना पर उन्होंने इंदिरा गांधी से कह कर तीन विवादास्पद कांग्रेसी मुख्य मंत्रियों को हटवा भी दिया था। यह सब उन्होंने अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए किया। लेकिन वे खुद ही बहुत जल्द सत्ता के दलालों से घिर गए। बोफोर्स का मामला तो ऐसा उलझा कि 1989 का आम चुनाव तो कांग्रेस हारी ही, उसके बाद से अभी तक उसे कभी भी बहुमत नहीं मिल सका है।

राहुल गांधी अब उसी तरह केे राजनीतिक हथकंडे का इस्तेमाल करना चाहते हैं। वस्तुतः वे दलितों-पिछड़ों को झांसा दे रहे हैं। गत लोकसभा चुनाव में खटाखट नकदी देने के लिए मतदाताओं से जो फार्म भरवाये गए थे, उस झांसे का भी अभी कोई हिसाब नहीं हुआ है।

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