धन्य हो आस्था !

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पं. राजीव पाठक/ मुंबई वार्ता

आज एक बार आस्था के पड़ाव पर जब खुद को टटोरा ।

तब उलझनों ने आगे बढ़कर मुझको ही लटोरा ।

मजबूरन सहारे की चाह में जब मैने नजरें घुमाई ।

तब भीड़ की अगड़ाई में कुछ भी न समझ आई ।।

थका हुआ , निराश जब मैने खुद को संभाला ।

तब जंग लगी जंजीरों को जतन से काट डाला ।

विश्वास की पहलू में जब आशाओं को समेटा ।

तब दर्द की सतह पर जाकर निराशा को चमेटा ।।

फिर अचानक चमत्कारों का सिलसिला क्या उमड़ा ।

विश्वास के प्रकाश में निराशाओं का घोंसला ही उजड़ा।

निष्ठा ने अनुशासन से श्रद्धा ने समर्पण से मैत्री का आगाज किया ।

तब आत्मविश्वास की लहरों ने व्यक्तित्व को संतुलित किया ।

वाह धन्य हो आस्था !

अब आगे तेरा क्या गुणगान करूं ।

बस अनवरत तेरी गोंद में रहकर नारायण का साक्षात्कार करूं ।।

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